कलम जब सत्ता की चौखट पर झुक जाए, तब पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता जन्म लेती है

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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ को बुलंद करना और सच को निर्भीकता से सामने लाना है। लेकिन वर्तमान समय में पत्रकारिता के एक हिस्से में ऐसी प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है, जहां कुछ लोग पत्रकार कम और सत्ता तथा वर्दी के प्रशस्ति गायक अधिक नजर आने लगे हैं। उनकी कलम सच और जनहित की जगह सत्ता की चमक और वर्दी की वाहवाही लिखने में व्यस्त दिखाई देती है।
समाज के जागरूक वर्ग का मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य किसी व्यक्ति, पद या वर्दी का अंधभक्ति भाव से गुणगान करना नहीं है। वर्दी चाहे किसी भी विभाग की हो, वह संविधान और कानून के दायरे में रहकर जनता की सेवा के लिए बनाई गई है। ऐसे में पत्रकार का कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि वर्दी अपने अधिकारों का उपयोग न्यायपूर्ण और पारदर्शी ढंग से कर रही है या नहीं। लेकिन जब कुछ पत्रकार सवाल पूछने के बजाय वर्दी की आरती उतारने लगते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।
वरिष्ठ सामाजिक चिंतकों का कहना है कि पत्रकारिता और जनसंपर्क में स्पष्ट अंतर होता है। जनसंपर्क का कार्य किसी संस्था या व्यक्ति की छवि चमकाना होता है, जबकि पत्रकारिता का उद्देश्य सच की पड़ताल करना और जनता के हितों की रक्षा करना है। यदि कोई पत्रकार सत्ता या वर्दी को सवालों से ऊपर मानने लगे, तो उसकी निष्पक्षता स्वतः समाप्त हो जाती है।
इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि समाज ने हमेशा उन पत्रकारों को सम्मान दिया जिन्होंने सत्ता के दबाव, भय और लालच के बावजूद सच का साथ नहीं छोड़ा। आपातकाल से लेकर अनेक बड़े घोटालों और जन आंदोलनों तक, निर्भीक पत्रकारों ने अपनी कलम के माध्यम से लोकतंत्र को मजबूत किया। दूसरी ओर, सत्ता के दरबार में बैठकर प्रशंसा गीत गाने वाले लोग समय के साथ गुमनामी में खो गए।
बुद्धिजीवियों का मानना है कि जब पत्रकारिता सत्ता की भक्ति में बदल जाती है, तब जनता का भरोसा टूटने लगता है। पत्रकार यदि जनता के प्रतिनिधि के बजाय सत्ता के प्रवक्ता बन जाएं, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है। पत्रकारिता की ताकत उसकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और निर्भीकता में है, न कि किसी पद, वर्दी या प्रभावशाली व्यक्ति की चापलूसी में।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकार अपनी मूल जिम्मेदारी को समझें और सच को सच कहने का साहस बनाए रखें। क्योंकि जिस दिन कलम सच छोड़कर सत्ता और वर्दी की भक्ति करने लगेगी, उसी दिन पत्रकारिता की मृत्यु और चाटुकारिता का जन्म हो जाएगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि पत्रकार सत्ता के दरबार में नहीं, जनता के बीच खड़े दिखाई दें।

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