ढल ना सके हम दुनिया के रंग में,

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सिख ना पाए छल प्रपंच।

काश कि हम भी सीख लिये होते,

दुनियां के सारे छल प्रपंच।

 

यूँ अकेले तन्हा ना रहते,

सुनते नहीं किसी के तंज।

काश कि हम भी सीख लिये होते,

दुनियां के सारे छल प्रपंच।

 

चेहरों पर मुस्कान बहुत थी,

दिल में जाने कितने राज रहे।

हमको अपना कहने वाले जाने,

कब से हमसे नाराज़ रहे।

हमने सबको मान दिया,

मिला हमें ही क्यों यह दंश?

काश कि हम भी सीख लिये होते,

दुनिया के सारे छल-प्रपंच।

 

अपनों के दर्द को अपना समझ,

हरपल उनके साथ रही।

दिल से हर रिश्ता निभाया,

बन कर बेजुबान रही।

सबको अपनापन देती रही,

सबसे रखा निस्वार्थ संबंध।

काश कि हम भी सिख लिये होते,

दुनियां के सारे छल प्रपंच।

 

अब किसी की मीठी बातों पे,

नहीं होगा विश्वास कभी।

दिल ही टूट गया है मेरा,

खतम हुए एहसास सभी।

हम भी पहचान लिए उनको,

जिनके मन में छिपा है दंभ,

हमने भी सीख लिया है,

दुनिया के सारे छल-प्रपंच।

 

मीठी बातें करने वालों ने,

भीतर कितने घाव दिये।

सीधे सच्चे बनकर हमने,

जाने कितने दर्द सहे।

हमने ठोकर खाकर सीखा,

दुनिया में रहने का ढंग।

दूर रहो अब हमसे यारो,

हमने भी सिख लिए हैं छल-प्रपंच!

 

बंदना मिश्रा

देवरिया उत्तर प्रदेश

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