अब की बार बहार में , आया खूब निखार।
सुता जन्म के हर्ष से , महक गया संसार।।
बिटिया ऐसी लाडली , जैसे महक गुलाब।
उसकी छवियाँ देख के , झूमें मन के ख्वाब।।
वह गुड़िया ओ पालना , बचपन की मुस्कान।
खेलों के संसार में , रंगी नन्हीं जान।।
मात – सुता को देख कर, हर जन करता नाज।
होती माँ का रूप है ,इक दुजे का साज।।
नहीं भ्रूण मसले मनुज , नन्हीं कोई लाज
रूठे इनसे नर नहीं , करो सुता पर नाज।।
मैका महकाती सदा , महकाए ससुराल।
प्रीत – रीत से चले, रिश्ता सालों साल।।
पुत्री अब सुत सम बनी, जीवन भर दे साथ ।
सुख – दुख की लाठी बनी, फर्ज निभाए हाथ।।
सारे जग के सुख मिले , खुशियाँ मिलें अपार।
बन सुहाग की लालिमा, सारे दुख हो पार।।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई।






