जोश था,मदहोश था,
लक्ष्य को भेदने का आक्रोश था।
जज्बा था ,उत्साह था,
कुछ कर दिखाने का ।
खंगाल कर पार कर सकूं,
हर कांटो भरे ,रास्तों का ।
इम्तिहान ऐ जिंदगी,
कुछ गम यूं दिए जा रहा है,
जोश, मदहोश,आक्रोश ,जज्बा ,उत्साह,
सब हताशा में बदलते जा रहा है ।
हर रास्ता धुंधला सा ,दिखता जा रहा है ,
मन अब उदास सा होता जा रहा है ।
मन ही युद्ध किए जा रहा है ।
निराशा की लहरों में ,बहे जा रहा हूं ,
हताशा से भरे जा रहा हूं ।
उदासी की मदहोशी ,ओढ़े जा रहा हूं ,
अपने ही विरुद्ध मैं ,युद्ध किए जा रहा हूं ।
आशाओं की किरणों से ,यूं छिपे जा रहा हूं,
हताशा से भरे जा रहा हूं।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






