भारत माँ के भाल पर, सजी स्वर्णिम बिंदी है,
हम सब का अभिमान है जो, वो हमारी हिंदी है।
जन-जन की यह भाषा है, और पूरे भारत की आशा है,
प्रेम, एकता और अपनेपन की, यह अनूठी परिभाषा है।
पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, सबको आपस में जोड़ती,
नफरत की हर दीवार को, यह बड़े प्यार से तोड़ती।
कबीर, तुलसी और रसखान ने, इसमें ही अमृत घोला है,
हर सच्चे हिंदुस्तानी ने, पहला शब्द इसी में बोला है।
यह सिर्फ एक भाषा नहीं, हम सबकी सच्ची पहचान है,
इसके मीठे शब्दों में बसती, हम सबकी जान है।
सरल, सहज और सुंदर है, यह संस्कृत की लाडली बेटी,
ज्ञान-विज्ञान की बातें भी, यह सहजता से है समेटती।
विदेशी शासन चला गया, पर बेड़ियाँ अभी कुछ बाकी हैं,
निज भाषा को कमतर समझना, बस मन की एक चालाकी है।
अंग्रेजी पढ़ना भी सीखो, दुनिया से कदम मिलाने को,
पर कभी न भूलो माँ के आँचल और अपनी मातृभाषा को।
आओ मिलकर आज लें शपथ, हिंदी को ऊँचा नाम देंगे,
केवल एक दिन ही नहीं, इसे हर दिन पूरा सम्मान देंगे।
हर सरकारी कामकाज में, इसका गौरव बढ़ाएँगे,
विश्व मंच पर हिंदी का, हम परचम आज लहराएँगे।
गर्व से कहो हम हिंदी हैं, और हिंदुस्तान हमारा है,
इसके बिना अधूरा लगता, भारत का हर नजारा है।
हिंदी दिवस का यह पावन पर्व, खुशियों के साथ मनाएँगे,
जन-जन के मानस में हम, हिंदी का अलख जगाएँगे।
स्वरचित एवं मौलिक
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश






