कुछ स्वप्न पलकों की चौखट पर
भोर से पहले ही दम तोड़ गए,
कुछ समय की कठोर हथेलियों में
रेत-से फिसलकर कहीं छूट गए।
मन ने चाहा था—
आकाश की नीली देह पर
अपना नाम लिखूँ,
पर परिस्थितियों के काले बादल
हर बार अक्षर भिगो गए।
कंधों पर अपेक्षाओं का आकाश,
आँखों में अनगिनत प्रश्न लिए,है
आज का युवा मुस्कुराता है,
अपने भीतर कितने युग जीकर।
दूसरों की उपलब्धियों के दर्पण में
जब स्वयं को छोटा पाता है,
तब भीतर का कोई कोना
चुपके से फिर एक सपना उगाता है।
उसे भय है असफलता का,
पर ठहर जाने से अधिक भयभीत है;
इसलिए टूटे हुए पंखों से भी
उड़ने की जिद में जीवित है।
अधूरे स्वप्न दरअसल अंत नहीं-
मन की अनलिखी पांडुलिपि हैं,
जिनके प्रत्येक रिक्त पृष्ठ पर
भविष्य की कोई नई कविता है।
कल जो सपना अधूरा रह गया,
आज वही संकल्प बनकर खड़ा है;
युवा की आँखों में अब भी
एक पूरा आकाश बचा पड़ा है।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






