उम्र की ढलान पर जीवन का उजास

Date:

कभी बुज़ुर्ग होना मानो जीवन के हाशिये पर चले जाना था। घर के किसी शांत कोने में बैठी आँखें अतीत के पन्ने पलटती रहतीं थीं और वर्तमान धीरे-धीरे उनकी हथेलियों से फिसलता जाता था। उम्र के साथ इच्छाएँ भी जैसे संन्यास ले लेती थीं। लेकिन समय बदला है और उसके साथ बुज़ुर्ग होने की परिभाषा भी।

आज का बुज़ुर्ग उम्र को ढोता नहीं, उसे जीता है।

उसके चेहरे की झुर्रियाँ अब केवल बीते वर्षों का हिसाब नहीं देतीं; उनमें अनुभव की रोशनी भी हैं और जीवन को नए ढंग से देखने की दृष्टि भी। वह जान चुका है कि परिवार के लिए समर्पित जीवन निस्संदेह मूल्यवान था, लेकिन स्वयं के हिस्से की खु़शियों को हमेशा टालते रहना जीवन का अनिवार्य धर्म नहीं।

अब वह सुबह पार्क में अपने मित्रों के साथ ठहाके लगाता है। कभी पुराने गीत गुनगुनाता है, कभी किसी यात्रा की योजना बनाता है। जन्मदिन मनाता है, मित्रों के साथ बैठता है, नई जगहें देखता है और कभी-कभी उन सपनों की ओर लौटता है जिन्हें गृहस्थी की जिम्मेदारियों के बीच कहीं पीछे छोड़ आया था।

पोते-पोतियाँ अब भी उसके स्नेह का संसार हैं, लेकिन उसके जीवन का एकमात्र संसार नहीं। उसने समझ लिया है कि प्रेम का अर्थ स्वयं को समाप्त कर देना नहीं, बल्कि संबंधों के साथ अपनी अस्मिता को भी बचाए रखना है।

उसकी पेंशन में अब केवल घर की ज़रूरतों का हिसाब नहीं होता; उसमें कुछ इच्छाओं के लिए भी जगह है। कोई किताब ख़रीदना, कहीं घूम आना, मित्रों के साथ चाय पीना या अपने किसी पुराने शौक़ को फ़िर से जगा देना, ये छोटी-छोटी चीज़ें उसके लिए जीवन के बड़े उत्सव बन गई हैं।

तक़नीक ने भी उसकी दुनिया के दरवाज़ें खोल दिएं हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर वह केवल समाचार नहीं देखता, बल्कि दूर बैठे मित्रों से संवाद करता है, नए विचार सुनता है, कुछ नया सीखता है। सोशल मीडिया पर अपने शौक के अनुसार नई नई रचनाएं पोस्ट करता है।वह यह स्वीकार करने से नहीं हिचकता कि सीखने की कोई आयु नहीं होती।

सबसे बड़ा परिवर्तन शायद उसके भीतर आया है।

अब वह हर बात पर शिक़ायत नहीं करता। बहुओं की पसंद-नापसंद को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाता। बच्चों से अपनी इच्छाओं का हिसाब नहीं माँगता। उसे धीरे-धीरे समझ में आ गया है कि अपेक्षाएँ जितनी कम होती हैं, मन उतना ही हल्का होता जाता है।

उम्र ने उसे एक गहरी सच्चाई सिखा दी है!

समय किसी के लिए रुकता नहीं।

जो कल था, वह स्मृति है;

जो आने वाला है, वह अनिश्चित है; हाथ में केवल आज है।

इसलिए आज का बुज़ुर्ग शायद जीवन की संध्या में नहीं, उसके सबसे शांत और परिपक्व उजास में खड़ा है। उसने समझ लिया है कि जीवन की सार्थकता केवल वर्षों की संख्या में नहीं, बल्कि उन वर्षों में भरी मुस्कानों, आत्मीय रिश्तों, अनुभवों और संतोष में है।

आख़िर एक दिन सब कुछ यहीं रह जाना है। न घर साथ जाएगा, न धन, न पद, न प्रतिष्ठा।

साथ जाएँगी तो शायद वे कुछ स्मृतियाँ, जिन्हें जीते समय हमने पूरी शिद्दत से महसूस किया था।

इसलिए उम्र के इस पड़ाव पर यदि कोई बुज़ुर्ग खुलकर हँसता है, यात्रा करता है, नाचता है, मित्रों के साथ समय बिताता है या अपने अधूरे सपनों को फिर से आवाज़ देता है,तो उसे देखकर मुस्कुराइए।

क्योंकि वह बुढ़ापा नहीं मना रहा,

वह देर से सही, अपने हिस्से का जीवन उत्सव की तरह जी रहा है।

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

spot_imgspot_img
spot_imgspot_img
spot_imgspot_img
spot_imgspot_img

लेटेस्ट खबरें

गांव-समाज की खबरें
Related

केशव ग्रीन सिटी’ में महा-रेस्क्यू ऑपरेशन सफल, सभी नागरिकों को सुरक्षित निकाला

जलप्रलय के बीच सीतापुर पुलिस बनी देवदूत   सीतापुर (दि ग्राम...

सांड के हमले में युवक की मौत, इलाज के दौरान तोड़ा दम

  महोली, सीतापुर। कोतवाली महोली क्षेत्र के ग्राम सरियामऊ में...

कुछ रिश्ते आवाज नहीं करते

कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं करते फिर भी उम्र भर सुनाई...

कितने नाम बदलता है

दादा बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। सब पैसे का खेल...