आंगन की आखिरी चिड़िया

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*अंक–29 : शहनाई के बीच एक सन्नाटा!*

 

बरसात थम चुकी थी, लेकिन चाची के जीवन में जैसे एक तूफान अभी भी बाकी था।

 

जिस घर में कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी, जिस आँगन में चूल्हे की आँच और रिश्तों की गर्माहट थी, वह घर अब मलबे में बदल चुका था। दीवारें गिर चुकी थीं, छत का नामोनिशान नहीं था और वर्षों से सँजोई गई गृहस्थी की छोटी-बड़ी चीजें मिट्टी और पानी में दब गई थीं।

 

चाची उस उजड़े हुए स्थान को देर तक देखती रहीं।

 

उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर कोई शिकायत नहीं।

 

पति को वर्षों पहले खो चुकी थीं। पढ़ी-लिखी इतनी नहीं थीं कि कहीं नौकरी करके अपने लिए कोई नया सहारा खोज लेतीं। जीवन भर परिवार के लिए जीने वाली उस स्त्री के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही था-अब कहाँ जाएँ?

 

उसी समय आर्यन वहाँ पहुँचा।

 

उसने चाची को देखा और कुछ पल चुप रहा।

 

फिर धीरे से बोला, “छोटी माँ!”

 

चाची ने सिर उठाया।

“हाँ बेटा।”

आर्यन उनके पास बैठ गया।

“आप अब यहाँ अकेली नहीं रहेंगी।”

 

चाची कुछ समझ नहीं पाईं।

“तो कहाँ जाऊँगी बेटा?”

आर्यन ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“मेरे घर।”

 

चाची ने तुरंत हाथ खींचते हुए कहा, “नहीं बेटा, तुम्हारी शादी होने वाली है। मैं तुम्हारे ऊपर बोझ नहीं बनूँगी।”

 

आर्यन की आँखें भर आईं।

“छोटी माँ, माँ कभी बोझ नहीं होती। आपने मुझे बचपन से अपने बेटे की तरह प्यार दिया है। आज अगर आपके लिए मेरा घर खुला नहीं, तो फिर मेरा बेटा होने का क्या अर्थ है?”

 

चाची कुछ कह नहीं सकीं।

आर्यन ने आगे कहा, “आप मेरे साथ रहेंगी। मेरी शादी होगी तो आप मेरे घर में होंगी। मेरे बच्चों की दादी बनेंगी। यह आपका भी घर है।”

 

पास खड़ी दिशिका की आँखें भी नम हो गईं।

वह आगे बढ़ी और चाची के कंधे पर हाथ रखकर बोली,

“चाची, भैया बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। आप कहीं नहीं जाएँगी। अब हम सब मिलकर रहेंगे।”

 

चाची ने दोनों बच्चों को देखा।

 

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

उस क्षण दिशिका को अपनी चाची का वह पुराना जीवन याद आया। पति बहुत पहले शराब की लत के कारण इस दुनिया से चले गए थे। कितने वर्षों से चाची ने अकेलेपन का बोझ अपने सीने में दबाकर जीवन काटा था।

 

दिशिका ने मन ही मन कुछ निश्चय किया।

 

वह बिना किसी को बताए अपनी बचत के पैसे निकाल लाई।

 

अपनी छोटी-छोटी जरूरतों में से बचाए हुए पैसों को जोड़कर उसने चाची के लिए तीन-चार सुंदर सिल्क की साड़ियाँ खरीद लीं।

 

उसे चिंता थी कि शादी में इतने मेहमान आएँगे। चाची कहीं अपने कपड़ों को लेकर संकोच न करें। वह चाहती थी कि उसकी चाची भी विवाह में उसी आत्मविश्वास और सम्मान के साथ खड़ी हों, जैसे परिवार की बाकी महिलाएँ।

 

दिशिका ने साड़ियाँ चाची के हाथ में रख दीं।

 

चाची ने हैरानी से पूछा, “बेटी! ये सब क्या है?”

 

दिशिका मुस्कुराई, “आपके लिए।”

 

“लेकिन मेरे पास तो कपड़े हैं।”

दिशिका ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,

“चाची, शादी मेरे भैया की है। और भैया की शादी में मेरी चाची सबसे सुंदर लगनी चाहिए।”

 

चाची के हाथ काँपने लगे।

उन्होंने साड़ियों को सीने से लगा लिया।

और फिर दिशिका को गले लगा लिया।

उस आलिंगन में वर्षों का अकेलापन पिघल रहा था

 

घर टूट गया तो क्या, रिश्ते तो बचा लिए,

अपनों ने आँसुओं में दीपक जला दिए।

दिशिका ने चाची के हाथों में रख दिए वस्त्र,

बिखरे हुए जीवन को फिर से सजा दिए।

 

दूर खड़ी रामबेटी यह सब देख रही थीं।

उनकी आँखों में आँसू थे।

 

लेकिन आज उन आँसुओं में दुःख नहीं था।

माँ होने का गर्व था।

 

उन्होंने मन ही मन कहा, “बच्चे सचमुच बड़े हो गए हैं…”

 

उन्हें लगा जैसे आज उनके वर्षों के संस्कारों ने उनके सामने आकर प्रणाम किया हो।

 

उन्होंने आर्यन को देखा—जो अपनी छोटी माँ का सहारा बन गया था।

 

फिर दिशिका को देखा—जो अपनी बचत के पैसे खर्च करके चाची के सम्मान की चिंता कर रही थी।

 

रामबेटी की आँखों से आँसू छलक पड़े।

 

घर उजड़ा तो क्या हुआ, अपना रहा परिवार।

 

आर्यन ने छोटी माँ, दे दिया अपना द्वार॥

 

 

 

रामबेटी ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया।

 

दोनों उनके चरणों के पास बैठ गए।

 

रामबेटी ने उनके सिर पर हाथ रखा।

 

कुछ बोलना चाहा, लेकिन गला भर आया।

 

बस इतना ही कह सकीं,

“मुझे तुम दोनों पर गर्व है।”

 

और फिर उन्होंने दोनों को सीने से लगा लिया।

 

उस दिन उस परिवार ने एक बहुत बड़ा सत्य समझा,

 

कभी-कभी प्रकृति घर की दीवारें गिरा देती है,

लेकिन अच्छे संस्कार रिश्तों की दीवारें और ऊँची कर देते हैं।

 

और शायद यही कारण था कि अगले कुछ दिनों में घर में बजने वाली शहनाइयों की तैयारी के बीच एक सन्नाटा भी था—लेकिन वह सन्नाटा दुःख का नहीं, उन रिश्तों की गहराई का था जिन्हें समय और परिस्थितियाँ और मजबूत कर रही थीं।

 

घर ईंट-पत्थरों से गिरा था,

मगर रिश्तों का घर और मजबूत हो गया था।

 

*शेष भाग अगले अंक में*

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

चन्दौसी जनपद संभल

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