माटी की गंध लिए जो निकला, शब्दों का वह साधक था,
जन-जन के दुःख को लिखने वाला, कलम का वह नायक था।
धनपत राय से प्रेमचंद बने, साहित्य-जगत के दीप हुए,
अभावों की आँधी में तपकर, जनमन के संदीप हुए।
‘गोदान’ में होरी रोया तो, किसान का दर्द मुखर हो गया,
धनिया के साहस के आगे, युग का छल भी बेअसर हो गया।
‘गबन’ ने लोभ-मोह के भीतर, मानव मन का सत्य दिखाया,
‘निर्मला’ ने दहेज-व्यथा का, करुण यथार्थ जगत को बताया।
‘सेवासदन’ ने नारी-जीवन के, प्रश्नों को स्वर प्रदान किया,
‘कर्मभूमि’ ने सेवा, सत्य और संघर्ष का पथ उजियार किया।
‘रंगभूमि’ में सूरदास बना, शोषित मानव का प्रतिकार,
‘प्रेमाश्रम’ ने किसान-पीड़ा को दिया संघर्ष का आधार।
‘कफन’ में भूख और गरीबी ने, मानवता को प्रश्न बनाया,
‘पूस की रात’ ने किसान का, ठिठुरता जीवन दिखलाया।
‘ईदगाह’ का नन्हा हामिद, त्याग और प्रेम सिखाता है,
‘पंच परमेश्वर’ न्याय-धर्म का, अंतरमन जगाता है।
न तलवार उठी, न रणभेरी—फिर भी युग को ललकार गए,
स्याही की कुछ बूंदों से वे, सोए हुए विचार जगा गए।
साहित्य उनके लिए केवल, मनोरंजन का साधन न था,
सत्य, करुणा, न्याय और मानवता से बढ़कर कोई वंदन न था।
हिंदी-उर्दू दोनों की धरती पर जिनका उज्ज्वल नाम रहा,
कथा-साहित्य में यथार्थवाद का जिनसे नया आयाम रहा।
आज भी जब किसान रोता है, होरी उसमें दिख जाता है,
जब अन्याय से मन लड़ता है, प्रेमचंद याद आता है।
उनकी लेखनी ने राजमहलों से अधिक झोपड़ियों को जाना,
भूखे बच्चे, श्रमित किसान, नारी का आँसू पहचाना।
वे चले गए, पर शब्द अभी भी जन-जन में जीवित हैं,
प्रेमचंद नहीं—वे हिंदी के धड़कते हुए चरित्र हैं।
कलम का वह सिपाही आज भी हमसे कहता है—
“साहित्य वही, जो मानव के आँसू पढ़ता रहता है।”
जब तक धरती पर शोषित की कोई आवाज़ रहेगी,
तब तक प्रेमचंद की लेखनी हिंदी में जीवित रहेगी।
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






