रामधारी सिंह “दिनकर” कवि थे, क्रान्तिकारी भारत के लाल।
ये प्रहरी धीर सजग हिमाद्री के, कलम युगों तक है निहाल।।
जन-गण में भावना देशभक्ति की, जागृत करती ‘रश्मिरथी’।
गंगा यमुना हिंद – महासागर , सम दिनकर महारथी।।
नव प्रभात की नई किरण सम, आलोकित जीवन करते।
भारत माँ के वीर सपूतों के उर, नवल स्फूर्ति भरते।।
वीरभूमि के योद्धा दिनकर, सीना चौड़ा रखते थे।
इंकलाबी नारों के हुंकार से, उर्जित करते थे।।
कहते आँधी – तूफानों में, संबल एक-दूजे का बनो।
शीश न झुकने देना माँ का, अवसर पर बलिदान चुनो।।
‘कुरुक्षेत्र’ में दिनकर लिखते, क्षमा गरल को ही सोहे।
सरल विनीत विषरहित हृदय, अमृत पर ही है मोहे।।
कर्मभूमि पर चलते रहना, रुकना यहाँ निषेधित है।
जीवन राह कठिन हो सकती, लेकिन यहीं से विकसित है।।
जब तक मानव के सारे सुख, भाग्य नहीं सम हो जाएँ।
जीवन के आपा-धापी में, शूर नहीं हम कहलाएँ।।
नश्वर इस जीवन में हमसब, उतना ही कुछ पाते हैं।
जितना श्रम पूँजी पाने में, दिन और रात लगाते हैं।।
कहते कभी जीवन प्रति पन्ने, उलटे क्रम से तुम पढ़ना।
फूल से अक्षर गढ़ते-गढ़ते, अंगारों पर भी चलना।।
जीवन के इस चहल-पहल में, संकट को तुम पहचानो।
सभापति के एक इशारे पर, तुम मर-मिटना जानो।।
नए भोर की नवल लालिमा, क्षितिज तलक ले जाएगी।
ढले दिवस हर रोज जिन्दगी,तिमिर बीच ले जाएगी।।
जन्मजयन्ती पर ‘दिनकर’ जी, करते आपको कोटि नमन।
देशभक्ति के सुन्दर भावों से, शत् बार करें वन्दन।।
डाॅ०(कु०)शशि जायसवाल, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
@स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित सृजन।
दिनांक- 23/09/2026






