कुंडलिनी में मेरा परिचय और राष्ट्रपति

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गंगा का तीरथ मिला , जन्मभूमि आध्यात्म।

 

जन्म लिया ऋषिकेश में , कुदरत का वह धाम ।

 

कुदरत का वह धाम, बड़ा ही सुंदर चंगा।

 

‘ मंजु ‘कहे है सत्य , बहे है पावन गंगा।।

 

माता मेरी शांति थी , प्रेमपाल पितु नाम ।

 

‘मंजु’ मुझे सब बोलते , करती उन्हें प्रणाम।।

 

करती उन्हें प्रणाम, बने गुरु विद्या दाता।

 

बलिहारी हूँ तात , मिली है प्यारी माता।।

 

अंतर लैंगिक था नहीं, मिलता मान समान।

 

क्रांति करी शैक्षणिक थी , साक्षर किया जहान।।

 

साक्षर किया जहान,दिया विद्या का मंतर।

 

दलितों को दी छाँव, नहीं था कोई अंतर ।।

 

शैशव में थे राष्ट्रपति , आए जब ऋषिकेश ।

 

मुलाकात में है मुझे, दिखा सरल था वेश।।

 

दिखा सरल था वेश , सौम्यता का था वैभव ।

 

आकर्षक व्यक्तित्व, देख के झूमा शैशव ।।

 

मिला राष्ट्रपति का मुझे, भर -भर आशीर्वाद।

 

हुयी सफल मन कामना , लेखन मिला प्रसाद।।

 

लेखन मिला प्रसाद, तभी शैशव सर्व हिला।

 

छोड़ दिया तब खेल, कलम का उपहार मिला।।

 

रच के तेरह कृति सभी , मिले प्रणित प्रतिमान ।

 

कवयित्री लेखक बनी, कलम बनी जग शान।।

 

कलम बनी जग शान , विश्व का है लिखती सच ।

 

बना योग गुरु देश , कीर्ति का फिर वैभव रच ।।

 

सकल सृष्टि का रो रहा , आज सखी है प्यार ।

 

प्रकृति पेड़ ऋतु सब विकल, बहे अश्क़ की धार ।।

 

बहे अश्क़ की धार , विदाई का आया पल ।

 

चली सुता घर छोड़ , निभाने पति धर्म सकल।।

 

गंगा यह ऋषिकेश की , पहुँची सागर पास ।

 

साजन स्वतंत्र हैं मिले , लगी मुम्बई रास ।।

 

लगी मुम्बई रास , सजन से दिल है रंगा।

 

मंजु सत्य है बात , मिले सागर में गंगा।।

 

प्यारी लगती मुम्बई, मिली मुझे पहचान।

 

महक कलम से है रहा, जग में हिंदुस्तान ।।

 

जग में हिंदुस्तान, यहाँ की संस्कृति न्यारी ।

 

सनातन है आधार ,वेद वाणी जग प्यारी ।।

 

डॉ मंजु गुप्ता

 

वाशी , नवीमुम्बई

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