कैसे धरम निभाऊँ अपना

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कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला।

मन चाहे प्रभु-पद लेकिन, चढ़ा हुआ है मोह का जाला।।

 

भोर भये तो काम बुलावै, साँझ पड़े खूब चिंता घेरे।

रोटी-रोजी, नाते-रिश्ते, अब धीर बंधाते मन को मेरे।।

तन संसार सँवारत जाए, मन खोजै प्रभु कर उजियाला।

कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला।।

 

ममता-मोह बाँधि के राखैं, मनवा कैसे छुट्टी पावै।

लोभ-लालसा बीच भटकता, शांति कहाँ से मन में आवै।।

नाम तुम्हारा दीपक बनकर, दूर करे मन का अँधियाला।

कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला।।

 

गृहस्थी भी प्रभु-दया मानकर, सेवा का आधार बनें।

कर्म करूँ निष्काम भाव से, मन यह तेरा नाम गुनें।।

घर के भीतर रहकर भी मैं, खोजूँ भीतर भाव निराला।

कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला।।

 

सुख में तेरा नाम जपूँ मैं, दुख में भी तुझको याद करूँ।

जो कुछ पाया कृपा तुम्हारी, सबकुछ तुझ पे वारि धरूँ।।

इतनी कृपा ‘शिव’ पर हो जाए, मिले सभी को रोज निवाला।

कैसे धरम निभाऊँ अपना, गृह कारज नाना जंजाला।।

कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती, रायबरेली–२२९३०६

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