गणपति बप्पा पधारे हैं,
लेकर मंगलमय उपहार।
गणेश चौथ की पावन बेला,
सजा चन्दौसी बारंबार॥
गूँजे जय-जय गणपति देवा,
गूँजे मंगल जयकार।
विघ्न विनाशक, बुद्धि प्रदाता,
कर दो सबका बेड़ा पार॥
चन्दौसी की गणेश चौथ,
भारत में अपनी अलग पहचान।
स्वचलित झाँकियों की शोभा,
देखे सारा हिन्दुस्तान॥
कल से ही मेला सजने लगा,
चहुँ ओर हुई चहल-पहल।
गाँव-गाँव से लोग चले हैं,
खुशियों से महका हर पल॥
कहीं खिलौनों की रंगीन दुकानें,
कहीं सजे हैं पकवान।
सोफ्टी की भी कतार लगी है,
बच्चों के खिलते अरमान॥
पकौड़ी वाली लंबी कतारें,
महक रहा सारा बाजार।
हँसते बच्चे, घूमते परिवार,
हर चेहरा लगता खुशहाल॥
एक दिवस गणपति बप्पा ने,
दिया स्वप्न में दिव्य संकेत।
डॉ. गिरिराज किशोर जी को,
मिला अनोखा पावन संदेश॥
स्वप्न में श्री गणेश पधारे,
दिया मेले का शुभ आधार।
उनकी प्रेरणा से सजने लगा,
गणेश चौथ का यह संसार॥
जो सपना उस रात दिखा था,
बनकर आज हुआ साकार।
डॉक्टर साहब की श्रद्धा ने,
कर दिया चन्दौसी का श्रृंगार॥
पहले सीता आश्रम तक ही,
सजता था मेला हर बार।
सड़क किनारे उमड़ती थी,
भक्तों की लंबी कतार॥
फिर मेले को मिला विस्तार,
मिला विशाल भूखंड अपार।
आज वही मेला ग्राउंड है,
चन्दौसी का गौरव-श्रृंगार॥
उनके उस पावन प्रयास का,
आज भी होता गुणगान।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ता जाता,
इस मेले का गौरव-गान॥
चौदह सितंबर की पावन तिथि,
रथयात्रा का होगा श्रृंगार।
गणपति जी की भव्य सवारी,
निकलेगी लेकर जय-जयकार॥
दूर-दूर से बैंड हैं आते,
लेकर अपने सुर-ताल।
अपने क्षेत्र की कला दिखाने,
होता सुंदर उनका कमाल॥
ढोल-नगाड़े, बाजे गूँजें,
गूँजे शहनाई की तान।
श्रेष्ठ बैंड को मिलता सम्मान,
बढ़ता कलाकारों का मान॥
रथ के आगे रंग बिखरते,
पीछे उमड़ता जन-सैलाब।
हर झाँकी में भाव अनोखे,
हर दृश्य बने लाजवाब॥
चलती-फिरती सुंदर झाँकियाँ,
देती संस्कृति का संदेश।
भारत की गौरवमय गाथा,
दिखती इनमें विशेष॥
बच्चों की आँखों में कौतूहल,
बुजुर्गों के मन में प्यार।
युवा संभालें उत्सव की धड़कन,
हर दिल में उत्सव का संसार॥
भूपाल मंच सजे निराला,
रंगारंग कार्यक्रमों की धूम।
कहीं गीत हैं, कहीं नृत्य हैं,
कहीं संस्कृति की मधुर धुन॥
कवि सम्मेलन जब सजता है,
शब्दों से महके वातावरण।
हँसी, हास्य और भावों से,
झूम उठे श्रोता का मन॥
अनेक प्रतियोगिताएँ होतीं,
प्रतिभाओं को मिलता मान।
जीतने वालों को उपहारों से,
मिलता उनका सम्मान॥
यह केवल मेला नहीं है,
यह संस्कृति का पर्व महान।
इसमें चन्दौसी की धड़कन,
इसमें अपनी मिट्टी की शान॥
गाँव, नगर और दूर जनपद से,
आते श्रद्धालु हर बार।
गणपति के दर्शन की खातिर,
भर जाता पूरा बाजार॥
हे गणपति! चन्दौसी पर तुम,
अपनी कृपा बनाए रखना।
हर घर में सुख-शांति बरसे,
दुःख की छाया दूर ही रखना॥
बच्चों को बुद्धि देना बप्पा,
युवाओं को सद्बुद्धि देना।
माता-पिता का मान बढ़े और,
हर मन में सच्चाई भर देना॥
व्यापार बढ़े, कलाकारों की,
प्रतिभा को सम्मान मिले।
मेहनत करने वाले हर जन को,
जीवन में सुख-सम्मान मिले॥
जिस स्वप्न से यह यात्रा निकली,
उस स्वप्न को प्रणाम हमारा।
गिरिराज किशोर जी की श्रद्धा,
बन गई चन्दौसी का तारा॥
मंगलमय हो गणेश चतुर्थी,
मंगलमय हो हर द्वार।
गणपति देवा कृपा बरसाओ,
खुशियों से भर दो हर परिवार॥
गणपति बप्पा मोरया!
मंगल मूर्ति मोरया!!
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
चन्दौसी जनपद संभल
स्वरचित मौलिक रचना






