लगता है यह ज़िन्दगी की शाम है
लोग शायद इसीलिए हैरान है!!
कोई नहीं समझता बुजुर्गों का दिल
एक ही तरह की सुबह शाम है!!
वह तन्हाई से जूझना वह ख़ाली-पन
सबकी ज़िन्दगी में आम है!!
लोग कतराते हैं इस उम्र में
बुजुर्गों का दूर से सलाम है!!
बदले में मांँ बाप को क्या चाहिए
औलाद का प्यार मिलना दुश्वार है!!
ज़मीन जायदाद में उलझे हैं लोग
कैसे बँटवारा हो यही खुले-आम है!!
नसीहत कौन समझता है आजकल
वृद्धाश्रम ले जाने के किस्से आम है!!
जब तक ज़रूरत थी रहे घर में
अब तो जीना भी हराम है!!
संस्कार मर गए हैं बच्चों के
मांँ-बाप के लिए दुआ ना सलाम है!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान






