
जब देखा था तुम्हे पहली बार
कुछ ख़्वाब लेने लगे थे आकार
तकती रह गई थी मैं निर्निमेष
जैसे और ख़्वाहिश नहीं है शेष
सोच रही थी मैं निर्विकार
कामनाएं दस्तक देने लगीं थीं
कोरे मन के द्वार
परिवर्तित हो रहे थे सुप्त विचार
सुषुप्त स्वप्न जो थे निःशेष
जागृत हो अब बन जायेंगे विशेष
जब भी मिलेगा उन्हें विस्तार
निश्चित ही ले लेंगे वो वृहद आकार
हर्षातिरेक हो रहा मन
जैसे हो आर्द्र चितवन
विलुप्त हो गए मन से विषाद
छाने लगा हिय में आह्लाद
निःसंदेह पूरे होंगे जीवन के रूठे ख़्वाब
जीवनपर्यंत निर्बाध
किंचित ना हो कभी प्रतिबाध
पूर्ण हो सारी कामनाएं ताउम्र अबाध
आराधना पी. मौर्य, लखनऊ






