कानपुर की गलियों में अब,
विकास बड़ा शर्माता है,
सड़कें गड्ढों में मिल जातीं,
नेता फीता कटवाता है।
नाले ऐसे इतराते हैं,
मानो गंगा की शाखा हों,
बरसात आते ही अफसर बोले —
“देखो! ये स्मार्ट व्यवस्था हो!”
कूड़े के ढेरों पर बैठी,
मक्खियाँ मीटिंग करती हैं,
और नगर निगम की गाड़ियाँ,
फोटो खिंचवा कर चलती हैं।
जनता पूछे — “साहब सुनिए,
सड़क कब तक टूटेगी?”
अफसर बोले — “फाइल चल रही”,
तब तक जनता झूलेगी।
हर चौराहे पर भाषण भारी,
हर पोस्टर में स्वर्ग दिखा,
लेकिन मोहल्लों की हालत देखो,
लगता जैसे युद्ध हुआ।
नेता जी के कपड़े चमकें,
चमके उनका पूरा दल,
लेकिन जनता की किस्मत में,
धूल, धुआँ और दलदल।
गंगा मैया भी सोच रही हों —
“कैसे भक्त महान मिले!”
आरती ऊँची, नाले गंदे,
वाह रे शहर के रखवाले!
चुनाव आते ही सब कहते —
“कानपुर को पेरिस करेंगे!”
पहले नाला साफ न होता,
अब सपने विदेश के देंगे।
अस्पतालों में लाइन लंबी,
बिजली आँख-मिचौली खेले,
जनता टैक्स समय पर भर दे,
सुविधा माँगो तो सब बहरे।
कुर्सी वालों याद भी रखो,
जनता सब पहचान रही,
जो कल तक चुप बैठी थी वो,
अब अंदर ही अंदर उबाल रही।
कानपुर फिर से चमकेगा,
ये सपना अब भी जिंदा है,
बस कुर्सी पर सेवा बैठे,
ना कि झूठ का धंधा है।
संजय कलमकार
कानपुर बना नरक —
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