प्रभाती वंदन के साथ चंद दोहा मुक्तक 

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कहती हूंँ अति प्रेम से, गणपति लो संज्ञान।

आए हो संसार में,श्रेष्ठ बनी पहचान।

बढ़ा हुआ व्यभिचार है, उत्सर्जन पर रोक,

करो व्यवस्था दूर यह, मांँग रही वरदान।।

 

सुनो गजानन मम विनय, चुनकर लाई फूल।

करो इसे स्वीकार तुम, क्षमा करो हर भूल।

दर्शन की अभिलाष है, खड़ी द्वार कर जोड़,

शुभदा का उपहार दो,मिटे अमंगल मूल।।

 

मंगल मूर्ति गणेश जी, सबसे अलग स्वरूप।

ज्ञान सुधा की वृष्टि से, मिटे तमस की धूप।

रिद्धि-सिद्धि शुभ-लाभ सँग,आप पधारो गेह,

पूर्ण करो मम कामना, महिमा बड़ी अनूप।।

 

कट जाते भव बन्ध है, जो भजता शुचि नाम।

भाव भरे नव रंग प्रभु, करें सफल हर काम।

संयम साधक बन सदा, करें भक्ति जो भक्त,

कृपा छांँव उनको मिले, जीवन हो अभिराम।।

 

डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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