मन फिर भी रोता है

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चलते-चलते थक जाता है

कभी-कभी इंसान,

कंधों पर संसार लिए फिर

ढोता है इंसान।

 

चेहरे पर मुस्कान सजा ले,

दर्द छिपा ले आँखों में,

कितने मौसम बीत गए हैं

मन की बंद निगाहों में।

 

सबके हिस्से धूप बाँटकर

खुद छाँव को तरसता है,

सबके आँसू पोंछ रहा जो,

अंदर-अंदर बरसता है।

 

दुनिया केवल कर्म देखती,

कौन हृदय को पढ़ता है?

बाहर जितना शांत दिखे जो,

अंतर उतना लड़ता है।

 

दायित्वों की राह कठिन है,

पग-पग धूप बिछी रहती,

होठों पर मुस्कान रहे तो

पीड़ा भी गुपचुप सिसकती।

 

समय सिखाता—दृढ़ बन जाना,

भाव न मन में आने देना,

पर संवेदनहीन होकर भी

जीवन कहाँ निभाने देना?

 

एक हँसी कुछ पल ठहरती,

फिर जाने क्यों खो जाती है,

एक पुरानी टीस अचानक

स्मृतियों में लौट आती है।

 

सोचा था, आँसू बह जाएँ,

मन हल्का हो जाएगा,

रात ढलेगी, नींद आएगी,

दुख भी दूर चला जाएगा।

 

किन्तु नयन जब सूख गए तो

पीड़ा फिर भी रहती है,

मौन हुआ अंतस, फिर भी

कोई धुन-सी बहती है।

 

दर्द सदा दुर्बलता नहीं है,

यह मनुष्य की भाषा है,

जिसके भीतर संवेदना है,

उसकी आँखों में आशा है।

 

टूटन में भी बीज छिपे हैं,

मौन में इक स्वर पलता है,

सूनी राहों के भीतर भी

कोई दीपक जलता है।

 

कल फिर सूरज उगेगा निश्चित,

रात सदा कब रहती है?

थकी हुई हर साँस किसी दिन

जीने की लय कहती है।

 

चलना ही जीवन की गति है,

रुकना अंतिम बात नहीं,

मन रोवे तो रो लेने दो—

आँसू कोई घात नहीं।

 

जब तक मन में करुणा जीवित,

तब तक जीवन शेष है,

जो आँसू को समझ सके वह

सचमुच व्यक्ति विशेष है।

 

कंधों पर सपने रखकर फिर

बढ़ता रहे इंसान,

राह कठिन हो, रात घनी हो—

फिर भी रहे उड़ान।

 

*दया भट्ट ‘दया’ उत्तराखंड*

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