मैं खुद से प्यार करती हूं

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अब खुद को समझने लगी हूं,

मैं खुद से प्यार करती हूं।

दुनिया की भीड़ में अब खोना नहीं,

अपने भीतर रहकर जीती हूं।

 

अब दूसरों को खुश करने के लिए,

अपनी खुशियों को छोड़ती नहीं।

हर रिश्ते को निभाने की खातिर,

खुद का आत्मसम्मान खोती नहीं।

 

मेरी मुस्कान और मेरी खामोशी,

दोनों ही मेरे अपने हैं।

खुशियां मिले या दर्द मिले,

पूरे करने अपने सपने हैं।

 

हर बार गिर कर खुद ही उठी,

जब भी टूटी खुद को समेटा।

अंधेरों में भी उम्मीद बनकर,

अपने साथ खुद ही खड़ी हूं।

 

मुझे अब किसी की मंजूरी नहीं,

मैं खुद से बहुत प्यार करती हूं।

अपनी हर कमी और हर खूबी से,

खुद को मिलाना चाहती हूं।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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