हिंदी साहित्य सुमन वाटिका में खिले हुए कतिपय पुष्पों ने अपने मनमोहक सुगंध से सारे वातावरण को सुरभित कर दिया था किंतु एक पार्श्व ऐसा था जहाँ ऊँचे-नीचे टीलों के अलावा और कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता था, आवश्यकता थी एक ऐसे वरदसुत की जो इस पार्श्व को समतल कर इसमें नवीन पुष्पों को आरोपित करे। शीघ्र ही एक ऐसा व्यक्ति उत्पन्न हुआ,वे थे हिंदी प्रांगण के मंझे खिलाड़ी एवं माँ सरस्वती के अमर पुत्र “श्री राम धारी सिंह ‘दिनकर’ ”
आप उस सूर्य समप्रभ थे जो अपनी स्वर्णिम आभा से धरती के अंधकार को हर लेता है ।आपने अपने ज्ञान रूपी आलोक से अज्ञान रूपी अन्धकार को हर लिया। आप उस भ्रमर के समान हैं जो जीवन रूपी मकरन्द तो देता है किन्तु डंक कभी नहीं मारता।
आपका का जन्म २३ सितम्बर सन् १९०८ में बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव स्थित एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। आपकी माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी तथा पिता का नाम श्री रवि सिंह था। जब आप मात्र दो वर्ष के थे, तभी आपके पिता का देहांत हो गया। आपका बचपन और शुरुआती जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा। आपकी प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों से पूरी हुई तथा पटना विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में बी.ए. (B.A.) की परीक्षा उत्तीर्ण की।
आजीविका के लिए आपने पहले एक विद्यालय में अध्यापन (शिक्षक) कार्य किया। इसके बाद बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्ट्रार, मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, और भारत सरकार के गृह विभाग में हिंदी सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दीं। आप सन् 1952 ई. में राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किए गए थे।
•साहित्यिक विशेषताएं-:
दिनकर जी को हिंदी कविता में ‘वीर रस’ का शिखर पुरुष माना जाता है। स्वतंत्रता से पहले उनकी कविताओं में विद्रोह, ओज और राष्ट्रप्रेम की प्रखर भावना दिखाई देती थी, जिसने देशवासियों में ऊर्जा भरी। स्वतंत्रता के बाद उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में अपार लोकप्रियता मिली।
ओज, विद्रोह, आक्रोश के साथ ही कोमल शृंगारिक भावनाओं के कवि दिनकर की काव्य-यात्रा की शुरुआत हाई स्कूल के दिनों से हुई जब उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा प्रकाशित ‘युवक’ पत्र में ‘अमिताभ’ नाम से अपनी रचनाएँ भेजनी शुरू की। 1928 में प्रकाशित ‘बारदोली-विजय’ संदेश उनका पहला काव्य-संग्रह था। उन्होंने मुक्तक-काव्य और प्रबंध-काव्य—दोनों की रचना की। मुक्तक-काव्यों में कुछ गीति-काव्य भी हैं। कविताओं के अलावे उन्होंने निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी, इतिहास आदि के रूप में विपुल गद्य लेखन भी किया।
•प्रमुख रचनाएं-:
*काव्य कृतियां: रेणुका (1935), हुंकार (1938), रसवंती (1939), कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी।
*गद्य / निबंध: संस्कृति के चार अध्याय, अर्धनारीश्वर, मिट्टी की ओर, रेती के फूल।
•प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान-:
*साहित्य अकादमी पुरस्कार: वर्ष 1959 में ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए।
*पद्म भूषण: वर्ष 1959 में भारत सरकार द्वारा सम्मानित।
*ज्ञानपीठ पुरस्कार: वर्ष 1972 में उनकी प्रसिद्ध काव्य-कृति ‘उर्वशी’ के लिए।
*24 अप्रैल 1974 को मद्रास (अब चेन्नई) में उनका निधन हो गया, किंतु उनका ओजस्वी साहित्य आज भी अमर है।
रामधारी सिंह दिनकर को ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पुस्तक के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से और काव्य-कृति ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया। उनकी स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक-टिकट भी जारी किया गया।
लेखिका —
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।।






