एक संस्मरण- आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक (सहारनपुर की एक आत्मीय भेंट)
इस भाग-दौड़ भरे युग में जब जीवित रिश्ते भी बोझ लगने लगे हैं, वहाँ एक ऐसा व्यक्तित्व है जो दिवंगत हो चुके रिश्तों को भी अपने आचरण से जीवित रखे हुए है।
मैं बात कर रहा हूँ “दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के प्रमुख एवं दिव्य गंगा सेवा मिशन के राष्ट्रीय संयोजक, परम श्रद्धेय डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय जी” की।
जहाँ रिश्ते इतिहास बन रहे हैं, वहाँ एक व्यक्ति जो इतिहास को रिश्ता बनाए हुए है
आज का सच यही है – किसी के पास समय नहीं। पिता पुत्र के पास दो मिनट बैठने का समय नहीं निकाल पा रहा, भाई बहन से केवल आवश्यकता पड़ने पर बात कर रहा है, पति-पत्नी एक ही घर में दो अजनबियों की तरह मोबाइल में खोए हैं। सब अपने में मस्त हैं।
और ऐसे में डॉ. पाण्डेय जी का जीवन एक साहित्यिक उपन्यास की तरह लगता है।
उनके मामा-मामी, बुआ-फूफा, मौसी-मौसा – वे सब शरीर रूप में अब इस लोक में नहीं हैं। गत हो चुके हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए रिश्ता शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है। पर डॉ. साहब के लिए नहीं।
वे आज भी अपने ननिहाल जाते हैं। उस आँगन में जहाँ मामा बैठा करते थे, उस चौखट को प्रणाम करते हैं। बुआ के घर, जहाँ अब बुआ नहीं हैं, पर बुआ के बच्चों को, उनके परिवार को वही सम्मान देते हैं जो बुआ के रहते देते थे।
यह क्या है? यह भारतीयता की सबसे उच्च परिभाषा है। हमारे शास्त्र कहते हैं –
“न जायते म्रियते वा कदाचित्, संबंधो हि आत्मनो धर्मः।” तथा ” शरीरं छणभंगुरं, सम्बन्ध: शाश्वत:”
शरीर मरता है, संबंध नहीं।,शरीर छणभंगुर है परन्तु संबंध शाश्वत- डॉ. पाण्डेय जी इस श्लोक के जीवंत भाष्य हैं।
सहारनपुर में उनके मामा जी के यहाँ एक पूजन के कार्यक्रम में उनसे भेंट हुई। मैंने देखा,इतने बड़े अंतर्राष्ट्रीय संगठन के एक राष्ट्रीय संयोजक, एक बड़े प्रकाशन समूह का प्रमुख, जिसके शब्दों पर हजारों लोग चलते हैं।वे इतने साधारण से हैं और पूजन कार्य में बड़े मनोयोग से लगे हुए हैं।
उन्होंने बताया – “आचार्य जी,मैं अपने रिश्तों को संजोये हुए बच्चों को भी यही शिक्षा देता हूँ ।मामा मामी को गये वर्षों हो गये परन्तु उनका, उनके दिये गये प्रेम भाव स्मरण अभी भी ताजा बना है, अब उनके पुत्र पुत्र बधू हैं सब में मामा मामी का ही दर्शन करता हूँ।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने सोचा, हम कथा में लोगों को पितृ-तर्पण सिखाते हैं, पर यह व्यक्ति तो जीवित पितृ-यज्ञ कर रहा है। दिवंगतों को भूलना नहीं, उनके छोड़े हुए रिश्तों को सींचना ही सच्चा श्राद्ध है।
मैंने पूछा – इतनी बड़ी जिम्मेदारी – ग्राम टुडे जैसा राष्ट्रव्यापी प्रकाशन, दिव्य गंगा सेवा मिशन जैसा विराट संकल्प – फिर भी इन बारीक रिश्तों के लिए समय कहाँ से?
बोले – “आचार्य जी, गंगा भी तो यही करती हैं। वह हिमालय से निकलती है, पर रास्ते में मिलने वाले हर छोटे नाले, हर सहायक नदी को अपने में समाहित करती चलती है। यदि वह सोचे कि मुझे तो सागर से मिलना है, इन छोटों को क्यों संभालूँ, तो वह गंगा नहीं रह जाएगीं। रिश्ते भी ऐसे ही हैं। बड़ों के जाने के बाद उनके अंश को संभालना ही गंगा बनना है।”
वाह क्या उपमा थी दिया डाॅ. साहब ने।
आज के समाज के लिए उनका जीवन एक लेख नहीं, एक सीख है-
वे हमें सिखा रहे हैं कि आधुनिकता का अर्थ जड़ों को काटना नहीं है।
दि ग्राम टुडे के माध्यम से वे गाँव की मिट्टी की बात को दिल्ली के सत्ता गलियारों तक पहुँचा रहे हैं, और दिव्य गंगा सेवा मिशन से गंगा की निर्मलता का अलख जगा रहे हैं। परन्तु उनका सबसे बड़ा अवदान है – यह सिद्ध करना कि व्यस्तता के बहाने रिश्तों से भागा नहीं जाता।
जिसके मामा-मामी, बुआ-फूफा, मौसी-मौसा गत हो चुके हों, वह भी यदि उनके आँगन में दिया जला रहा है, तो हम जो जीवित रिश्तों से मुँह मोड़े हैं, हमें लज्जा आनी चाहिए।
डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय जी केवल एक नाम नहीं हैं। वे इस युग में रिश्तों के अंतिम दीपक हैं, जो आँधी में भी जल रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ी को रास्ता दिखा सके।
ऐसे रिश्तों के ऋषि को मेरा प्रणाम।
आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक
(यज्ञाचार्य एवं भागवत कथा व्यास)
श्री बज्रांग आश्रम देवली प्रतापपुर प्रयागराज
रिश्तों के इस मरु काल में एक वटवृक्ष के रूप में हैं डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय जी
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