आज के आधुनिक युग में “व्यस्तता” मनुष्य का सबसे बड़ा आवरण बन चुकी है, जिसके पीछे वह अपनी आंतरिक अव्यवस्था, भ्रम और दिशाहीनता को चतुराई से छिपाए फिरता है। जब कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि “मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है,” तो वह असल में अपनी व्यस्तता का ढिंढोरा नहीं पीट रहा होता, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं के अंतहीन भंवर में फंसे होने की अपनी असमर्थता को स्वीकार कर रहा होता है।
बाहरी दुनिया में अंधी दौड़-भाग करना, अनगिनत दायित्वों को अपने कंधों पर ओढ़ लेना और खु़द को हर पल किसी न किसी कार्य में उलझाए रखना इस बात का प्रमाण नहीं है कि जीवन किसी सार्थक दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मनुष्य के भीतर की शांति पूरी तरह ग़ायब हो चुकी है। व्यस्त रहने वाला मनुष्य अपनी अमूल्य ऊर्जा को किसी रचनात्मक दिशा में लगाने के बजाय उसे चारों ओर बिखेर देता है। उसका चित्त ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाता है जहां शारीरिक गति तो तीव्र होती है, किंतु गंतव्य का कोई बोध नहीं होता। ऐसी स्थिति को गतिशीलता नहीं, बल्कि केवल एक मानसिक भगदड़ कहा जा सकता है।
इसके बिल्कुल विपरीत, एक सुलझा हुआ और संगठित मनुष्य कभी भी समय के अभाव का रोना नहीं रोता। वह अपने जीवन के प्रत्येक पल को एक मौन ठहराव और पूर्ण सजगता के साथ जीता है। उसके पास अपनों के लिए समय होता है, आत्ममंथन के लिए अवकाश होता है और जीवन की गहराइयों में उतरने की छटपटाहट होती है। एक अस्त-व्यस्त व्यक्ति परिस्थितियों के आगे विवश होकर केवल प्रतिक्रिया देता है, जबकि एक व्यवस्थित मनुष्य अपनी चेतना से जीवन का सुंदर सृजन करता है।
यह समय इस गहरे भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ने का है कि अधिक काम करना ही सफ़लता या महत्ता की एकमात्र क़सौटी है। जब तक़ मनुष्य अपने भीतर की इस आंतरिक अस्त-व्यस्तता को समेटकर मौन, ठहराव और संतुलन की ओर नहीं लौटता, तब तक उसकी सारी व्यस्तता मात्र एक निरर्थक कोलाहल बनकर रह जाएगी।
-डॉ.दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।






