
अधकचरे ज्ञान, नैतिक शिक्षा और मानवीय मूल्यों से परे केवल और केवल धनोपार्जन या नौकरी की ओर उन्मुख करती वर्तमान शिक्षा व्यवस्था, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित और आयातित खुली चर्चाएँ, वासनाओं को उत्तेजित करने वाली सामग्रियों की आसान उपलब्धता, एकल परिवार और सोशल मीडिया की चकाचौंध आदि के संयुक्त दुष्प्रभावों से दिन-प्रतिदिन सामाजिक परिवेश विकृत होता जा रहा है. ऐसे वातावरण में ‘स्वतंत्रता’ का सही मायने विलुप्तप्राय होकर ‘स्वच्छंदता’ के रूप में पांव पसारता जा रहा है.
स्वच्छंद रहने की बातों को स्वतंत्रता बता बताकर वर्तमान जेन-ज़ी पीढ़ी का एक वर्ग जब से तर्क देने लगा है, तब से रिश्तों में भरोसे का स्थान और भी रिक्त सा होने लगा है, विशेषकर दो युगलों के मध्य, जिसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ रहा है. जेन-ज़ी की पैतृक पीढ़ी वह पहली पीढ़ी बन गई है जिसके दोनों ओर डर आया है. पहले यह पीढ़ी अपने माता-पिता और घर के बड़ों से, अदब-लिहाजवश ही सही, डरती थी और अब वह अपनी संतति के व्यवहार से डरती है, भले ही वह व्यवहार उसकी संतति का व्यक्तिगत रूप से स्वयं उसी के लिए ही क्यों न हो.
एक ओर ‘स्वतंत्रता’ सामाजिक नियम और मर्यादा के दायरे में रहकर आपनी बात कहने और कार्य करने की आजादी देती है, तो वहीं दूसरी ओर ‘स्वच्छंदता’ का अर्थ सामाजिक नियम, मान-मर्यादा और दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करके मनमाना आचरण करना है. यह आचरण दर्शाता है-मेरी मर्जी, मैं जो चाहूं वो करूँ’ और यही तर्क वर्तमान पीढ़ी में देखने को मिल रहा है.
स्वदेश की बात करें तो सभ्यता जब से जन्मी है, समाज कैसा भी रहा हो-पितृसत्तात्मक रहा हो, जाति और धर्मों में बँटा रहा हो या रूढ़िवादी विचारधारा वाला रहा हो-इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर तमाम जननायक-नायिकाओं और समाज सुधारकों ने आवाज उठाई है. उन्होंने कुप्रथाओं के साथ-साथ तमाम सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और शोषण का अंत करवाया है. निःसंदेह, रूढ़िवादी विचारधारा और पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों के शोषण पर भी बड़ा प्रहार हुआ है और बदलाव की न केवल इबारत लिखी गई है, बल्कि बदलाव भी खूब हुआ है. हम यह नहीं कहते कि मानसिकता पूरी तरह बदल गई है और अब कुछ गलत नहीं हो रहा है, फिर भी किसी न किसी रूप में निरंतर परिवर्तन हो रहा है. लेकिन सामाजिक नियम और मर्यादाओं को तार-तार करती, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित कहूँ अथवा दुष्प्रभावित, स्वतंत्रता की माँग या स्वयं-स्वीकारिता वास्तव में स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ‘स्वच्छंदता’ की माँग और स्वीकारिता है.
अच्छी-खासी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी, सूचना क्रांति के दौर में टेक्नोलॉजी की समझ और उपयोग में पिछड़ी पैतृक पीढ़ी या उससे ऊपर की पीढ़ी के सामाजिक जीवन के अनुभव और ज्ञान से वर्तमान पीढ़ी न तो कुछ सीखना चाहती है और न ही समझना चाहती है. बल्कि यह पीढ़ी प्रयोग करना चाहती है और कर भी रही है.
ऊर्जा से लबरेज इस पीढ़ी को अपनी ऊर्जा को नियंत्रित करते हुए कार्य करना चाहिए, किंतु स्वतंत्रता के भ्रम में स्वच्छंदता को अपनाते हुए, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के समन्वय के दर्शन से परे, केवल अर्थ की दौड़ और काम में डूबकर प्रयोग पर प्रयोग कर रही है. सामान्य चर्चाओं के दौरान पैतृक पीढ़ी के पास केवल इतना कहकर चुप हो जाना होता है, ‘आज की पीढ़ी बड़ी प्रैक्टिकल हो गई है.’
जरूरी नहीं कि हर प्रयोग का परिणाम सफल और सकारात्मक ही हो. अंकुश तो बिल्कुल उचित नहीं था, लेकिन नियंत्रण आवश्यक था, जो दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है. परिणामस्वरूप, अर्थ और काम की अति-लालसा ने नई पीढ़ी के एक बड़े वर्ग को जितना शातिर बनाना शुरू कर दिया है, उतना ही उसे भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर अस्थिर और कमजोर भी किया है.
एकल होते परिवारों के साथ-साथ वासनाओं को संबल प्रदान करने वाली सामग्रियों की हर हाथ में उपलब्धता जैसे-जैसे आसान होती जा रही है, अर्थ से भी अधिक प्रयोग ‘काम (वासना)’ पर होने लगा है. ऐसा नहीं है कि पहले ऐसा नहीं हो रहा था; पहले भी हो रहा था, लेकिन वर्तमान पीढ़ी इसे स्वतंत्र प्रेम के रूप में, कभी ‘लव’ तो कभी ‘अफेयर’ की नई-नई परिभाषाओं में गढ़कर ऐसे कृत्य कर रहा है, जिनसे न केवल वह स्वयं दहल जा रहा है, बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से का भरोसा भी टूट रहा है.
रिश्तों की मर्यादा से कहीं अधिक भयावह है भरोसे का तार-तार होना है. इन्हीं में कुछ अधकचरे ज्ञानी पौराणिक साहित्यों के दर्शन को समझने के बजाय उनके कथानकों का उदाहरण देकर अगले कांडों को बल देने लगते हैं और उन्हें उचित ठहराने का प्रयास करते हैं. यह पीढ़ी कितनी भी प्रैक्टिकल क्यों न हो जाए, अभी भी समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिस पर विकृत होते समाज का प्रभाव नहीं पड़ा है. यही वतग अभी भी समाज को सही दिशा दे सकता है.
चूँकि बुराइयाँ बहुत तेजी से फैलती हैं, उनका संक्रमण समाज को पूरी तरह दूषित कर सके, इसलिए उससे पहले सभी को शिक्षा के साथ-साथ अपने बच्चों में संस्कारों के प्रति, रिश्ते-नातों और पारिवारिक संबंधों के प्रति तथा अर्थ से अधिक नैतिक मूल्यों के प्रति सजग होना होगा. स्वयं के आचार-व्यवहार तथा भावी पीढ़ी के प्रति दुलार, प्यार और अनुशासन पर स्कूली शिक्षा के समय से ही ध्यान देना होगा और ध्याननके साथ साथ समय देना होगा.
समाज में सुधार किसी एक की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है. सभी को अपनी जिम्मेदारी न केवल सुनिश्चित करनी होगी, बल्कि उसे कार्यरूप में परिणित भी करना होगा. अन्यथा विकृतता तो अनियंत्रित है ही, उसके दुष्परिणामों का शिकार कोई एक नहीं होगा कभी न कभी सभी को होना पड़ेगा.
लेखक
धर्मेन्द्र कुमार सिंह
सामाजिक विचारक एवं समाज सेवी
कानपुर
मोबाइल नम्बर 7860501111






