मैंने पूछा—“हिंदी! कहो, क्या तुम्हें कभी राष्ट्रभाषा कहा जाएगा?”
वह मुस्कुराई—“नहीं, अभी तो मेरे हिस्से में बस प्रतीक्षा का वनवास है।”
मैंने फिर पूछा—“फिर तुम्हारा भविष्य क्या है, कहाँ तक जाएगी तुम?”
बोली—“जहाँ तक अपनी मिट्टी की गंध को संजोए मनुष्य जाएगा, मैं भी वहीं रहूँगी।”
संस्कृत की गोद से निकली, प्राकृत की गलियों में पली, अपभ्रंश की देहरी लाँघकर,
जन-जन की वाणी बनी, कबीर की साखी और तुलसी के मानस में ढलकर।
पर सत्ता के गलियारों में पराई चमक ने जब अपना सिंहासन सजाया,
तब अपने ही घर में मुझे कभी-कभी मौन, उपेक्षित और विस्मृत पाया।
मैंने पूछा—“हिंदी, तुम बीच राह में कहाँ गुम हो गई थीं?”
वह बोली—“गुम नहीं हुई थी, तुम्हारी ज़ुबानों पर चुपचाप जीवित थी।”
“तुमने मुझे बाज़ार में छोड़ा, शिक्षा में बाँटा, प्रतिष्ठा के तराज़ू पर तोला,
फिर भी मैंने तुम्हारे आँसू, तुम्हारे स्वप्न और तुम्हारे गीतों को अपनी गोद में खोला।”
मैंने कहा—“तो चलो, आज मैं तुमसे एक वादा करती हूँ—तुम्हें केवल भाषा नहीं, अपना स्वाभिमान मानूँगी।”
हिंदी हँसी—“मुझे राष्ट्रभाषा का नाम मिले न मिले, बस तुम्हारे जीवन में सम्मान मिले—मैं फिर भी अमर रहूँगी।”
नीलचित्रा व्यास (चित्रलेखा व्यास)
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)






