मशीनों के जंगल में
मुखड़ा
कल की नस में आज बहे,
मन का अपना रक्त रहे,
मशीनों के जंगल में भी
मन का एक वृक्ष रहे।
नीली-नीली स्क्रीनें हों,
खिड़की पर हो धूप,
अँगुलियों में विश्व सिमटे,
मन न जाए चुप।
सूचनाओं के शोर तले
सोच जगे हर क्षण,
ज्ञान बढ़े तो साथ बढ़े
संवेदित-सा मन।
कल की नस में आज बहे,
मन का अपना रक्त रहे……..
किताबों से प्रश्न निकलें,
प्रश्नों से विज्ञान,
माटी छूकर खोजें बच्चे
नव-नव कोई ज्ञान।
रोबोटों के साथ चले फिर
हँसता मानवीय स्पर्श,
चाँद छुए विज्ञान भले ही,
धरती रहे सहर्ष।
शहरों की पत्थर-नस में
पेड़ों की हरियाली,
बादल केवल चित्र न हों,
बरसे खेतों वाली।
नदी न केवल नक्शे में हो,
उसकी लहरें गाएँ।
बच्चे उसकी गोद में बैठ
अपना कल बतियाएँ।
कल की नस में आज बहे,
मन का अपना रक्त रहे,……
जाति-धर्म की बंद गली से
खुलें नई राहें।
एक-दूसरे के दुख में हम
अपना दुख ही चाहें।
जिस आँगन में दीप न पहुँचा,
वहाँ ज्ञान की भोर,
किसी बच्चे के सपनों पर
न लगे कोई रोक।
ऊँची हों उपलब्धियाँ पर
मन छोटा न हो,
जीत मिले तो साथ किसी का
हाथ छूटा न हो।
धन से पहले मान मिले और
मानवता का मोल,
नई सदी की मुट्ठी में हो,
धरती का अनमोल।
परिकल्पित हो ऐसा कल,
जिसमें मन उजियारा हो।
तकनीकों के हाथों में भी
ममता का सहारा हो,
आज लिखें जो कल की भाषा,
कल उसको दोहराए।
हमसे बेहतर नई पीढ़ी
अपना जग रच पाए।
ऐसा हो निर्माण कि जिसमें
मनुष्य प्रथम ही रहे,
मशीनों के जंगल में भी
मन का एक वृक्ष रहे।
कल की नस में आज बहे,
मन का अपना रक्त रहे,
मशीनों के जंगल में भी
मन का एक वृक्ष रहे।
स्वरचित
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार






