रिश्तों के बंधन

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मधुर, सुदृढ़ हम रिश्ते बनाते,

हृदय तृप्त कर  तृषा  बुझाते,

पुलकित,मन हर्षित हो जाते,

रिश्तों के बंधन हमको भाते ।

 

यदि  स्नेह  जल  सींचे  जाते ,

एकांकीपन   को  भर   जाते ,

मधुर  स्वप्न  सौगात   सजाते ,

फिर न अकेले हम रह  जाते ।

 

सुख-दुख में ये साथ निभाते,

सेवा   का  अवसर  दे   जाते,

प्यार,दुआएँ और  सुख  पाते,

ये खुशियों के  फूल खिलाते ।

 

कटुक वचन से  ना बच पाते ,

धैर्य, समर्पण  इन्हें   पनपाते ,

द्वेष ,वैर, छल से  मिट  जाते ,

जो न इन्हें पलकों पे सजाते ।

 

त्याग,भरोसा,आदर अपनाते,

प्रेम ,वाणी संयम से महकाते,

सद्व्यवहार हम जब अपनाते,

रिश्तों के बंधन खिल मुस्काते ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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