जिंदगी की किताब के,
सारे पन्ने जैसे भर चुके थे।
मैं पन्ने पलटती रही,
शब्द खामोश हो चुके थे।
कुछ पन्नों में खुशियां,
कुछ पन्नों में गम था।
कुछ पन्नों में अपने रिश्ते,
कुछ में गैरों का दम था।
कुछ पन्नों में मुस्कुराना,
कुछ पन्नों में रूठते अपने।
कुछ पन्नों में थी उदासी,
कुछ पन्नों में टूटते सपने।
फिर खोला मैंने आखरी पन्ना,
जहां लगा जिंदगी खत्म हुई।
पर फिर देखा एक नया पन्ना,
फिर नए किरदार की शुरुआत हुई।
आखिरी पन्ने के बाद नयी जिंदगी,
फिर से आंखों ने देखा सपना।
भूत भविष्य छोड़कर अब मुझे,
संघर्ष की आग में है तपना।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






