पतंजलि,गोरखनाथ,स्वात्माराम, घेरंड और श्रीनिवासभट्ट द्वारा प्रदत्त प्राणायाम का बिगडता स्वरूप: एक विवेचना
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1.)योगाभ्यास की हरेक परंपरा में प्राण के महत्व को स्वीकार किया है।प्राण की उपेक्षा करके योगाभ्यास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। विभिन्न संप्रदायों में योगाभ्यास की सैकड़ों पद्धतियां विद्यमान हैं। अब्राहमिक कल्चर के अंतर्गत पारसी, यहुदी,ईसायत, इस्लाम तथा इनसे प्रेरित विभिन्न मतों में योगाभ्यास की अवधारणा मौजूद नहीं है।भारत में भी पिछले 100-150 वर्षों के दौरान केवल किसी गुरु द्वारा नामदान आदि से मुक्ति की अवधारणा पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं। इनके लिये किसी अनुशासन,संयम,तप, योगाभ्यास,आहार -विहार आदि की कोई आवश्यकता नहीं है।बस किसी ढोंगी, अपराधी,जेल की सजा काट रहे तथाकथित स्वघोषित संत से नामादि ले लो। फिर कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। इनमें से हरेक स्वघोसित संत के लाखों की संख्या में चेले -चेलियां मौजूद हैं। इन्होंने खुद को परमात्मा मानकर पूजवाना शुरू कर दिया है।
2.)सनातन- धर्म में ऐसा कभी भी नहीं होता है। इसमें आचरण,संयम, त्याग, तपस्या, अनुशासन, आहार- विहार,निद्रा,दिनचर्या,ऋतुचर्या आदि सबका महत्व होता है। भारत में अब्राहमिक शैली पर चलने वाले पचासों मत पैदा हो गये हैं।ये वास्तव में सभी के सभी नास्तिक हैं।ये संसार को संचालित करने वाली किसी शक्ति को न मानकर बस अपने गुरु को ही परमात्मा मानते हैं।इनकी कोई न कोई बांसुरी या शब्द वाणी या पुस्तक या गुरु पूजन पद्धति या नामदान विधि या मंत्र या धुन या तीर्थ -स्थली आदि अवश्य होते हैं। इन सबने सनातन धर्म से ही कोई श्लोक या शिक्षा या पंक्ति चोरी करके अपने अपने पंथों का अलग से निर्माण किया हुआ है। क्योंकि अलग से अपनी पंथिक दुकानदारी चलाना है, इसलिये सनातन धर्म के विरोध में बोलना इन सबमें सामान्यतः पाया जाता है। बारहवीं से लेकर सत्रहवीं सदी के कालखंड में कबीर,दादू,नानक आदि संतों ने सनातन धर्म की रक्षा करने के लिये उत्तम प्रयास किये थे, लेकिन उन्नसवीं -बीसवीं सदी के कालखंड में इन्होंने संत, गुरु, सद्गुरु आदि पदवियों की आड़ लेकर सनातन -धर्म को तो कमजोर किया ही, इसके साथ राष्ट्रवासियों से उनके बल,पौरुष,क्षत्रियत्व और राष्ट्र -रक्षा के जज्बे भी समाप्त करने का काम किया है। इन्होंने उन धूर्त और विश्वासघाती विदेशी हमलावरों के साथ आये धर्मांध मिशनरियों के सामने एकतरफा प्रेम, सौहार्द और भाईचारे के गीत गाते रहकर भारतवर्ष को एक आसान टारगेट बनाने का काम किया है।आज भी ये वहीं कर रहे हैं। इनको दुश्मनों की पहचान बिल्कुल भी नहीं है।
3.)संत परंपरा के अधिकांश गुरुओं ने राजयोग,हठयोग,तंत्रयोग में मौजूद विभिन्न शुद्धिकरण योगाभ्यास आदि का खंडन इसलिये किया था, क्योंकि इसकी आड़ में शोषण शुरू हो गया था। वास्तव में उनके मन में इन सबके प्रति भरपूर सम्मान मौजूद था।बाद के तथाकथित नकली गुरुओं ने उपरोक्त संतों की आधी बात को पकड़ लिया और आधी को छोड़ दिया।आज भी यह पागलपन चल रहा है। कुछ अपवादों को छोड़कर बारहवीं सदी से लेकर इक्कीसवीं सदी के कालखंड में मौजूद रहे किसी भी सद्गुरु या संत या फकीर या नामदानी गुरु ने अफगान,तुर्क,मुगल,मंगोल, फ्रांसीसी,ब्रिटानी हमलावरों से यह पूछने का दुस्साहस नहीं किया कि आप अपने देश में जाकर क्यों नहीं रहते हो-आप हमारे देश में आकर शासन क्यों कर रहे हो -आप हमारे लाखों वर्षों पुरातन सनातन धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर क्यों लगे हो- हमारे भारत पर हम शासन करेंगे,तुम विदेशी नहीं? एकतरफा भाईचारे, सौहार्द,प्रेम, करुणा और भक्ति की पीपनी बजाते रहे। उनके पदचिन्हों पर चलने वाले आजादी के पश्चात् भारत में पचासों तथाकथित संत मौजूद हैं।इनकी विभिन्न सरकारों, पूंजीपतियों से सांठगांठ रहती आई है। ये नेताओं के लिये एकमुश्त वोट का इंतजाम करते हैं तो नेता इनके लिये जैड सुरक्षा सहित अनेक सुविधाएं प्रदान करते हैं।ये कभी भी किसान, मजदूर और बेरोजगार युवाओं के समर्थन में नहीं खड़े हुये हैं। इन्होंने कभी भी भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन नहीं किये हैं।धर्म, नैतिकता, अनुशासन,विवेक, जागरुकता और होश जैसा इनके पास कुछ भी मौजूद नहीं होता है।ये पूरी तरह से करोड़ों लोगों का एक साथ माईंडवाश करके नेताओं के लिये वोट का जुगाड करने का साधन बनकर रह गये हैं। राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र बलिदान जैसा इनमें कुछ भी नहीं होता है।
4.) संत परंपरा के सैकड़ों गुरु लोग यदि राजयोग के प्राणायाम के साथ हठयोग के प्राणायाम की साधना को भी स्वीकार करके अपने अनुयायियों को तैयार करते तो भारत बहुत शीघ्र स्वतंत्र हो जाता। बौद्ध मतानुयायियों की विनाशकारी उन्मुक्त भोगवादी जीवन-शैली से भारतीयों को सावधान करके नाथ परंपरा के नाथों ने सनातन भारतीय योगानुसार मौजूद राजयोग के साथ हठयोग की प्राणायाम प्रणाली को भी भरपूर महत्व प्रदान करके भारत की युवाशक्ति को जहां सत्य योगाभ्यास में लगाया था, वहीं पर सैनिक शक्ति को खड़ा करने में भी मदद की थी। इन्होंने बलिष्ठ भुजदंड वाले राष्ट्ररक्षक लाखों सैनिकों को भी तैयार करने में मदद की थी। अपने दुश्मनों से एकतरफा शान्ति,सह- अस्तित्व, संतुलन,प्रेम, करुणा,सर्वपंथसमभाव और भाईचारे की बातें करने की प्रवृत्ति ने भारत को दुनिया का सबसे अधिक असुरक्षित राष्ट्र बनाने में सहायता की है।
5.)प्राणायाम करने की कुंभक वाली शैली और आते -जाते -रुकते प्राण को सिर्फ देखते रहने की शैली परस्पर जुड़ी हुई हैं।ये एक -दूसरे की विरोधी न होकर परस्पर पूरक हैं।बिना कुंभक किये प्राण को साक्षीभाव से देखते रहकर विचार,मन, अहंकार, बुद्धि,चित्त तक की यात्रा नहीं हो सकती। ऐसा व्यक्ति कभी भी अपने आत्मस्वरुप में स्थित नहीं हो सकता है। यदि देह में अस्थिरता या कोई किसी प्रकार की दिक्कत हो,तो व्यक्ति देह में ही अटका रहेगा। उसके लिये देह से पार जाना असंभव हो जाता है। ठीक इसी तरह यदि श्वास-, प्रश्वास में कोई दिक्कत हो,तो भी साधक का सर्वप्रथम अपने श्वास- प्रश्वास को ठीक करना आवश्यक होता है।इसको किये बगैर कोई भी साधक श्वास- प्रश्वास से आगे नहीं जा सकता।वह श्वास प्रश्वास पर ही अटका रहेगा। इससे उसकी देह भी अनेक रोगों से ग्रस्त हो जायेगी।भारत में देह को निरोग रखने के लिये आसन, व्यायाम और युद्धक कलाओं का विकास किया गया है।श्वास -प्रश्वास को ठीक करने के लिये प्राणायाम का विकास किया गया है।इन दोनों यानी देह और श्वास -प्रश्वास वाले हिस्सों को संतुलित,सही और आत्मस्थ होने के योग्य बनाने के लिये प्रयास और अप्रयास वाली विधियों का प्रयोग लाखों वर्षों से होता आ रहा है।केवल प्रयास या अप्रयास वाले हिस्से को पकड़कर बैठ जाना खतरनाक सिद्ध होता है।
6.)यदि कोई व्यक्ति शारीरिक व्यायाम, खेलकूद, परिश्रम,सैर या अन्य शारीरिक हरकतें नहीं करेगा,तो उसके शरीर का बिमारियों का घर बन जाना अवश्यंभावी है। केवल इसलिये योगाभ्यास के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के आसनों और मार्शल आर्ट्स का विकास किया गया है। ठीक इसी तरह ही श्वास और प्राण के शरीर में भरपूर मात्रा मात्रा होने को सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न प्रकार के प्राणायाम का विकास हुआ है।इन प्राणायामों में रेचक,पुरक के साथ कुंभक का सर्वाधिक महत्त्व होता है। योगाभ्यास करने के अनिच्छुक और चेले -चेलियों की भीड़-भाड़ बढ़ाने में रुचि रखने वाले तथाकथित गुरुओं ने प्राणायाम में ‘कुंभक’ का विरोध करके केवल श्वास- प्रश्वास को देखते रहने पर जोर दिया है।इसे किसी ने सहजयोग,किसी ने लययोग, किसी ने प्राणापान, किसी ने आनापानसति, किसी ने विपस्सना तथा किसी ने अन्य बेढंगे और अव्यावहारिक नामों से संबोधित किया है। स्वयं सिद्धार्थ बुद्ध ने कयी योगाचार्यों,सांख्याचार्यों और हठयोगाचार्यों के मार्गदर्शन में योगाभ्यास करके निर्वाण को प्राप्त किया था। लेकिन उनके देहावसान
के पश्चात् उनके अनुयायियों ने अज्ञानता या जानबूझकर वास्तविक योगाभ्यास को तिलांजलि देकर एकतरफा आनापान और विपस्सना जैसी विधियों पर जोर देकर युवाशक्ति के जोश को ठंडा करके सैनिक शक्ति के रूप में भारतवर्ष को कमजोर और आलसी बनाने में मदद की। भारतवर्ष सैनिक शक्ति के रूप में उसी समय से कमजोर होना शुरू हो गया था।सैनिक शक्ति के रूप में कायरता,भगौडेपन,पलाययनवाद की तरफ जाने का बीजवपन तभी हो गया था।हालांकि सनातनधर्मी और स्वयं बौद्ध शासकों ने इन शिक्षाओं की उपेक्षा करके सैनिक शक्ति के रूप में युवाशक्ति को इस प्रकार की एकतरफा योग विधियों से दूरी बनाने की कोशिशें जारी रखी थीं। लेकिन बाद में बौद्ध शासक भी इस बिमारी से नहीं बच पाये और इसी के परिणामस्वरूप विदेशी हमलावरों का सामना नहीं कर पाने की वजह से भारत में बौद्ध मत के विनाश का कारण भी बने। सनातनधर्मी शासकों ने इस प्रकार की बेतुकी शिक्षाओं से दूरी बनाकर रखी थी, इसलिये वो बहादुरी से विदेशी हमलावरों का आखिरी तक बहादुरी से सामना करते रहे थे। लेकिन जो नुकसान युवाशक्ति में पौरुष और बल को बढ़ाने वाली बौद्ध भिक्षुओं की आनापान,विपस्सना और उन्मुक्त भोग विलास की तांत्रिक विधियों ने किया था,उसका कुछ प्रभाव तो सनातनधर्मी शासकों और युवाशक्ति पर पड़ना ही था। आदि शंकराचार्य के पश्चात् उनके अद्वैतवादी आचार्यों में इस संसारविरोध की पलायनवादी बिमारी ने प्रवेश कर लिया।बाद में इसका प्रभाव बहुत से संतों पर भी पड़ा था। एकतरफा भिक्षुवाद के रूप में संसार विरोध,संन्यास,निवृत्तिवाद ,मायावाद आदि तथा अपने दुश्मनों को नहीं पहचानकर एकतरफा आदर्शवादी मूल्यों करुणा, सौहार्द,प्रेम और भाईचारे का प्रभाव ऊपर वर्णित पचासों समकालीन तथाकथित गुरुओं और भारतीय राजनीतिक परिवेश पर पूरी तरह से मौजूद है।
7.) योगाभ्यास में राजयोग,तंत्रयोग, हठयोग के अंतर्गत कुंभक की उपेक्षा करने और स्वाभाविक रूप से चल रही श्वास का अवलोकन करते रहने की एकतरफा शिथिलीकरण की विधियों ने भारत को नपुंसक, कमजोर, नाकारा और पाखंड बनाकर रख छोड़ा है।इस समय भी अधिकांश योगाचार्य, योग -शिक्षक,नामदानी तथाकथित गुरु तथा अष्टावक्र गीता,श्रीमद्भगवद्गीता और सांख्य को मानने वाले आचार्य लोग योगाभ्यास के अंतर्गत प्रामाणिक पातंजल प्राणायाम (बाह्यवृत्ति,आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभ शवृत्ति, बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी) तथा प्रामाणिक हठयौगिक प्राणायाम
(रेचक पुरक कुंभक) की घोर उपेक्षा कर रहे हैं। इसलिये योगाभ्यास के कोई रुपांतरणकारी परिणाम नहीं आ पा रहे हैं। शारीरिक ,मानसिक और भावनात्मक तल पर बिमारियों और बिमारों की संख्या दिन दोगुनी और रात चोगुनी बढ़ोतरी हो रही है।’कुंभक’ के माध्यम से शरीर में प्राण -ऊर्जा को बढ़ाकर जहां पर शरीर और मन को मजबूती प्रदान करना है, वहीं पर यह आत्मसाक्षात्कार में भी भूमिका तैयार करता है।हठयोगी श्रीनिवासन भट्ट हठरत्नावली में कहते हैं –
विचित्र कुंभकाभ्यासात् विचित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/4)
अर्थात् कुंभक के अभ्यास से योगाभ्यास में ऊंचाईयां आनुभूत होती हैं।
8.) महर्षि घेरंड ने घेरंड संहिता में आठ प्राणायामों को कुंभक के भेद कहा है –
सहित: सूर्यभेदश्च उज्जायी शीतली तथा। भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा केवली चाष्टकुंभका:।।
अर्थात् सहित, सूर्यभेदी,उज्जायी,शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी,मूर्च्छा,केवली- ये आठ कुंभक हैं।
हठयोगप्रदीपिका में स्वात्माराम योगी कुंभक के महत्व को समझाते हुये कहते हैं –
तत्र सिद्धये विधानज्ञाश्छित्रान्कुर्वंति कुंभकान।
विछित्र कुंभकाभ्यासाद्विछित्रां सिद्धिमाप्नुयात्।।(2/43)
अर्थात् प्राणायाम के विधान को जानने वाले योगी योगाभ्यास में आगे बढ़ने के लिये विभिन्न प्रकार के कु़भकों का अभ्यास करते हैं।इन विचित्र प्रकार के कु़भकों के अभ्यास से योगी साधक योग में सिद्धि प्राप्त करते हैं।
9.)आज से साढ़े पांच हजार वर्षों पहले महर्षि पतंजलि ‘योगसूत्र’ में कुंभक के संबंध में कहते हैं –
बाह्याभ्यांतरस्तंभवृत्तिर्देशकालसंख्याभि: परिदृष्टो दीर्घसुक्ष्म:।।(2/50)
अर्थात् देश,काल, संख्या का ध्यान रखते हुये बाह्यवृत्ति, आभ्यंतरवृत्ति,स्तंभवृत्ति प्राणायाम के अभ्यास से प्राण सूक्ष्म,लंबा,सहज और शिथिल हो जाता है। इसके करने से मन शांत होने लगता है। विचारों के भंवर उठना बंद हो जाता है।इस सूत्र में बाह्य कुंभक,अंत: कुंभक और कहीं भी कुंभक को देश,काल,संख्या के गणित से करने के माध्यम से मन पर नियंत्रण को समझाया गया है।
10.) आज भारत के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में स्थित योग- विभागों, सैकड़ों प्रसिद्ध योग- आश्रमों तथा हजारों छोटे स्तर के योग -केंद्रों में जहां आसनों को व्यायाम और एक्सरसाइज की तरह किया और करवाया जा रहा है, वहीं पर विभिन्न प्राणायामों को डिप ब्रीदिंग की तरह किया और करवाया जा रहा है।इस प्रकार से आसनों और प्राणायामों का अभ्यास शास्त्रीय मर्यादा के प्रतिकूल है।इस तरह से अभ्यास करने से लाभ की बजाय हानि अधिक हो रही है।मन को शांत करने या मन को साक्षीभाव से देखना कभी भी संभव नहीं होगा। जो थोड़ा -बहुत इससे प्राण -ऊर्जा का जागरण होता है,वह भी जनमानस की नकारात्मकता में बढ़ोतरी करके हिंसक कृत्यों को बढ़ाने में सहयोगी बन रहा है।इस तरह के शास्त्रविरोधी योगाभ्यास से मनुष्य के शरीर,प्राण, विचार,मन,भाव आदि स्तरों पर विकृति उत्पन्न होकर उसे आत्मस्थ होने से रोक रहा है। इससे मानसिक तनाव,चिंता, घृणा, द्वेष, इर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना और हिंसक वृत्तियों में वृद्धि होती जा रही है। शांति, संतुष्टि,संतुलन,सौहार्द, प्रेम,करुणा , भाईचारा और संवेदनशीलता को प्राप्त होना तो बहुत दूर की बात हो जाती है। इससे जहां पर जनमानस का आध्यात्मिक, भावनात्मक,आर्थिक शोषण हो रहा है; वहीं पर योगाश्रमों और योगाचार्यों के व्यापार में हजारों गुना बढ़ोतरी हो रही है। ऋषि प्रदत्त योग और योगाभ्यास की बदनामी का माध्यम उपरोक्त तंत्र बनता जा रहा है।इस रोकथाम होना चाहिये। इसके लिये शास्त्रीय मानकों पर आधारित योग और योगाभ्यास को प्रचलन में लाया जाना आवश्यक है।यह आश्चर्यजनक है कि शास्त्रीय योग और योगाभ्यास के प्रचार -प्रसार में उपरोक्त तथाकथित योगाचार्य और योगशिक्षक ही अधिक जिम्मेदार हैं।
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डॉ.शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119






