विधा-गीत सृजन
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
माटी का यह तन है प्यारे,
कर ले मन को निर्मल धर्म।
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
मधुर वचन से मन जीत ले,
दुखियों के आँसू हर ले।
भूले-भटके पथिक को राह दिखा,
सेवा के दीपक धर ले।
तेरा धन-दौलत रह जाएगी,
साथ चले बस कर्म।
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
कल का किसने देखा जग में,
आज प्रेम से जी ले।
द्वेष-राग सब दूर भगाकर,
नेह सुधा मन पी ले।
मन मंदिर में सत्य जगा ले,
छोड़ कपट का मर्म।
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
जितनी साँसें मिलीं विधाता से,
उनका मान बढ़ाना।
जिस राह मिले कोई असहाय,
उसका हाथ थाम जाना।
जग से जाते नाम रहेगा,
अच्छे कर्मों का धर्म।
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
प्रेम बाँटकर, दीप जलाकर,
जीवन सफल बनाना।
तेरे जाने के बाद भी जग में,
तेरी खुशबू रह जाना।
यही साधना, यही कमाई,
यही मनुज का धर्म।
जीवन के इन चार दिनों में,
करता चल शुभ कर्म।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार






