विविध

मशीनों के जंगल में

मुखड़ा कल की नस में आज बहे, मन का अपना रक्त रहे, मशीनों के जंगल में भी मन का एक वृक्ष रहे।   नीली-नीली स्क्रीनें हों, खिड़की पर हो धूप, अँगुलियों में...

संवेदना से शाश्वत सत्य तक : रविशंकर शुक्ल का काव्य संसार

डा. सीमांत प्रियदर्शी रायबरेली के वरिष्ठ रचनाकार श्री रविशंकर शुक्ल जी की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिल...

करुणा सिंह “कल्पना” : साहित्य, सेवा और संवेदना की सशक्त हस्ताक्षर

— डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय भारतीय संस्कृति की मूल चेतना सेवा, संवेदना और सृजन में निहित है। जब कोई व्यक्तित्व इन तीनों आयामों को अपने...

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