“सुन लो विनती प्रभु”
हाँथ जोड़ विनती करूंँ,करूँ तुम्हारा ध्यान,
काज तुम्हारे ही होवें,यही कहें दिन मान।
कृपा सदा भक्तों पर करना, ऐसी मेरी टेर,
बुद्धि-विवेक क्षीण न हो,लोभ मोह न घेरे,
दया-धर्म की राह चलूँ, हे करुणानिधान!
प्रभुवर विनती क्षणिक सुनो तुम
वरद हस्त हो आजीवन हम पर
स्वास्थ्य-सम्पदा सबको देना
जो करे तुम्हारा,उर में ध्यान।
दयासागर है हृदय तुम्हारा, लेते सब संज्ञान
ऊँच-नीच न होती तुमसे, ऐसा है संविधान
मनुज विवेक जब अपना खोए,
अधर्मी व्यभिचारी बन जाए,
मानवता से रिश्ता छोड़े,
फिर भी राह दिखाते तुम।
तुम ही तो हो निर्माणक, पोषक, संहारक,
हम तो याचक,अंश हैं तेरे ऐ मेरे संचालक।
सुन लो विनती हे भगवान
दया रखना हे कृपानिधान।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, © ®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।






