पुस्तक के पन्नों में अपना आकाश

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डाॅ.दक्षा जोशी

आज जब हमारी उँगलियाँ मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार चलतीं रहतीं हैं, तब पुस्तक के पन्ने जैसे धीरे-धीरे हमारी दिनचर्या से दूर होते जा रहे हैं। सूचनाओं की बाढ़ है, पर चिंतन का समय घटता जा रहा है; शब्द बहुत हैं, मग़र शब्दों के भीतर उतरने का धैर्य कम होता जा रहा है।
सिंगापुर में प्रतिदिन कुछ समय पढ़ने को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक पुरस्कार की पहल ने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखा है कि क्या पढ़ने के लिए भी हमें किसी पुरस्कार की आवश्यकता पड़नी चाहिए? पढ़ना केवल अक्षरों को आँखों से गुज़रते हुए देखना नहीं है। यह मन के बंद दरवाज़ों पर दस्तक है। एक अच्छी पुस्तक हमारे भीतर सोए हुए प्रश्नों को जगाती है, दृष्टि को व्यापक करती है और जीवन को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण देती है। मोबाइल हमें क्षणिक मनोरंजन दे सकता है, लेकिन पुस्तक हमें ठहरना सिखाती है। मोबाइल सूचना देता है, पुस्तक उस सूचना को विचार में बदलने की क्षमता देती है। सोशल मीडिया हमें दुनिया से जोड़ता है, जबकि साहित्य कई बार हमें अपने भीतर से जोड़ देता है। आज आवश्यकता केवल यह कहने की नहीं कि “बच्चों को किताबें पढ़नी चाहिए।” आवश्यकता है कि घर में पुस्तक का वातावरण बने, अभिभावक स्वयं पढ़ें, बच्चे पढ़ते हुए देखें और परिवार में कभी-कभी स्क्रीन की जगह शब्दों का साथ चुना जाए। क्यों न हम प्रतिदिन केवल 15 मिनट अपने लिए सुरक्षित करें ! मोबाइल से दूर, पुस्तक के पास !? क्योंकि पढ़ी हुई हर अच्छी पंक्ति हमारे भीतर कहीं न कहीं अपना घर बना लेती है।पढ़ने के बदले पैसे मिलें, यह अच्छी बात हो सकती है;लेकिन बिना पैसे के पढ़ने की इच्छा जाग जाए,तो वही किसी समाज की वास्तविक समृद्धि है।

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

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