पूर्वज़ों की अतुल्य धरोहर,
तुम अपनी पहचान हो।
ज्ञान सरोवर तुम हो हिन्दी,
तुम अपना सम्मान हो।।
लिखें पढ़ें हम बोलें तुमको,
रक्षा करें तुम्हारी।
‘सच्चिदानन्द’ यह यत्न करे,
सदैव तेरा मान हो।।
तुमसे तुलसी कबीर जाना,
जाना सूर और श्याम।
जीवन के सारे सुख पाये,
तुमसे हीं पाया नाम।।
प्रेम – भक्ति तुम पुण्यमयी हो,
संस्कृति – सभ्यता महान।
सबसे प्यारी भाषा हिन्दी,
हमसब जन की जान हो।।
विश्व पटल पर शोभायमान तू,
चन्द्रमा – सूरज समान।
भारतीयों के कण्ठ प्रिय तू,
हर घर की तू है शान।।
जितनी कीर्ति गाये कम है,
करे हम कितना बखान।
अपना स्वाभिमान तुम्हीं हो,
गिरमिट जन अभिमान हो।।
गोवर्धनसिंह फ़ौदार ‘सच्चिदानन्द’
पता :मॉरीशस।






