जीवन हमें कब किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे ये हम सोच भी नहीं सकते । इंसान दुनिया में सब कुछ भूल सकता है लेकिन उसके साथ जो बीतता है वह कभी नहीं भूल पाता। आज की कहानी में कोई फिजूल बात नहीं बल्कि एक रिश्ते की सौगात हैऋ लिए है। अगर हमारा विश्वास सच्चा है तो हालात के हाथों मजबूर होकर विश्वास की जीत होती है।
*कैसे आइए इस कहानी के माध्यम से हम जानने की कोशिश करते हैं:-*
*1* छोटे से गांव में रतनलाल जी की किराने की दुकान थी। वे बड़े दयालु धर्मात्मा आदमी थे। गांव में वही सबसे बड़े समझदार थे। उनकी पत्नी कमला देवी भी बहुत ही शालीन मितव्ययि महिला थी । दोनों बहुत मेहनत करते थे उनके एक ही बेटा था मुकेश जो शहर में जज की पढ़ाई करने गया था ।मुकेश अपनी जज की परीक्षा पास कर अपने माता-पिता से मिलने आ रहा था।
*2*मगर रब को कुछ और ही मंजूर था,:-*
अचानक से उसकी कार का एक्सीडेंट हो जाता है। उसमें बैठे उनके दोस्तों को चोट लगती है लेकिन मुकेश की वहीं मौत हो जाती है । लोगों ने घरवालों को समाचार दिया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ बोल सुबह तो मेरी बात हुई और अभी ऐसे कैसे हो सकता है बहुत समझाया पर वह नहीं माने।
*3 बुढ़ापे का सहारा टूटा:-*
बेटे की लाश अपने सामने देखकर रतनलाल और उनकी पत्नी का बुरा हाल था । मां अपने बेटे को बार-बार गोद में लेकर पुकारती थी बेटा उठ बेटा उठ और बार-बार बेहोश हो जाती थी । मां बेटे के गम में पागल सी हो गई थी पूरे दिन दरवाजे पर इंतजार करते रहती बेटा आएगा बेटा आएगा। रतन लाल जी कहते उसका फोन आया है वो कल आएगा ऐसे दिलासा देकर उन्हें घर में ले जाते और खाना खिलाते थे। रतनलाल जी ने अपनी बीवी की हालत देख कर बहुत हिम्मत रख रखी थी। वे कभी अकेले में होते तो रोया करते थे।
*4 अब कुदरत का करिश्मा देखो:-*
गांव में होली मिलन पर एक कवि सम्मेलनका आयोजन रखा गया था । उन चार कवियों में एक कवि की शक्ल उनके बेटे मुकेश से हुबहू मिलती थी । सभी गांव वाले अचानक उसका पोस्टर देखकर चौंक गए थे । गांव वालों ने रतनलाल जी को वो पोस्ट दिखाया। रतन लाल की सोचा पत्नी को बताऊं शायद वो ठीक हो जाए। रतनलाल जी ने पोस्ट कमला के सामने रखा।
*5*अचानक से फोटो देख वह हंसने लगी:-*
कमला देवी उस फोटो को देखकर बहुत खुश हुई।उसने अपने आंसू पोंछे साड़ी को ठीक करने लगी गांव वाले से बोली देखो मैंने कहा था ना मेरा बेटा आएगा वो आ रहा है कल तुम सबको मिलाऊंगी अपने हाथों से उसकी पसंद का खाना बनाऊंगी कमला देवी गम के मारे टूट चुकी थी। पैरों से चला नहीं जाता था हाथ भी बहुत कांपते थे मगर विश्वास अभी तक जिंदा था ।
*6 बेटे की खुशी में बने पकवान।*
कमला से खड़ा नहीं हुआ जाता था फिर भी कुर्सी पर बैठ करके गाजर का हलवा दाल के पकोड़े आलू छोले की सब्जी और पूरी बनाई। उनके हाथ में टिफिन थमाते हुए बोली अपने हाथ से बेटे को खिलाना। बोलना तेरी मां ने बहुत याद किया है । रतन लाल जी टिफिन लिए भीड़ में से बीचों-बीच चले जा रहे चिल्ला रहे थे बेटा तेरा नाम सुन के आया हूं मां का प्यार साथ में लाया हूं।
*7 एक रूबरू मुलाकात ऐसी भी:-*
रतनलाल जी के हाथ कांप पर रहे थे फिर भी टिफिन संभाल रखा था पैर लड़खड़ा रहे थे। बेटा तेरी मां भी आना चाहती थी लेकिन घुटनों के दर्द से उसका बुरा हाल है। बेटा देख मां ने तेरे लिए दाल के पकोड़े गाजर का हलवा वही छोले की सब्जी पूरी बनाई है। तू खा जरूर लेना इसे पटकना मत कहते कहते वो रोने लगे । कुछ देर के लिए कवि को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कुछ पल के लिए सम्मेलन में एक सन्नाटा सा छा गया था सिर्फ रतनलाल जी की आवाज और आंसू दिखाई दे रहे थे। उन्हें देख गांव के सभी लोग खड़े हो गए थे।कवि भी ये देख दंग रह गया। स्टेज से ही बोला रुकिए बाबूजी मैं अभी आता हूं और लपक के कवि ने रतनलाल जी के हाथ से टिफिन पकड़ा उन्हें कुर्सी पर बैठाया थोड़ा पानी पिलाया । इतना अनूठा प्यार देखकर कवि की आंखों से भी अविरल धारा बहने लगी रतनलाल जी के चरणों पे गिरने लगी ।
*8 रिश्तों की कद्र:-*
ऐसा लग रहा था मानो बरसों बाद भरत मिलाप सा पिता पुत्र का मिलन हो रहा है सारे गांव के लोगों की आंखों में आंसू थे। सबने ये अनूठा मिलन देखा, तालियां बजाई आज के कवि सम्मेलन का ये एक अनूठी मिशाल बना ।
कभी कुदरत का करिश्मा ऐसा हो जाता है कि ना चाहते हुए भी हम मोह माया में खो जाते हैं ।अनजाने रिश्ते भी अपने से लगने लगते हैं इतना प्यार देखकर मुझे आज लगा रिश्ते खून से ही नहीं बल्कि दिल से भी जुड़े होते हैं। ना जाने कब,कहां,किससे मुलाकात हो जाए कह नहीं सकते। इतनी काव्य गोश्तियां की किंतु इतनी दौलत कहीं नहीं मिली जितनी आज बाबूजी के आशीषों से मिली है। दोस्तों यदि हमारे दो मीठे बोल से किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाए, किसी को नई जिंदगी मिल जाए तो देर मत करना,पीछे मत हटाना यहां कभी कोई छोटा बड़ा नहीं होता। (ये मेरी जिंदगी का एक अनूठा सफर है जिसे मैं कभी भुला नहीं सकता)
कवि ने टिफिन खोलकर दो तीन चम्मच गाजर का हलवा खाया दो पकौड़ी खाई दो चम्मच बाबूजी को भी खिलाई। दौलत तो हम जिंदगी में कभी भी कमा सकते हैं लेकिन मां-बाप का प्यार बार-बार नहीं मिलता।
*9 कवि के मन की बात:-*
कवि ने सोचा था कि समय मिला तो प्रोग्राम के बाद मिलता जाऊंगा लेकिन दोस्तों ममता के पीछे आज स्टेज छूट गया। मैं बाबूजी के साथ उस और चल दिया जहां पलके बिछाए, इंतजार में एक मां बेटी थी । मैं नहीं जानता था दोस्तों मेरी जिंदगी में रिश्तों का एक ऐसा मोड़ भी आएगा। सारा गांव उनके पीछे-पीछे हो लिया था। मां दरवाजे पे टकटकी लगाए बैठी थी। आंखों से अविरल धारा बरस रही थी। रो रो के चेहरा लाल हो गया था।
*ममता उमड़ी बैशूमार:-*
मुझे देखते ही बेटा आ गया बेटा आ गया करने लगी। मैंने मां के चरण छुए। मां ने आशीष रूपी हाथ मेरे सिर पे रखा,मेरा माथा चूमने लगी,मेरे सिर पे हाथ फिराने लगी। मां के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।शायद बेटे के मिलन में बह रहे थे। बेटा आ गया तू, देखो गांव वालों *मेरा विश्वास जीत गया मैं कहती थी मेरा बेटा आएगा देखो मेरा बेटा आ गया ना*
मां को देखकर अचानक मेरी आंखें भी बहने लगी और मैं मां के गले से लिपट कर मां मां कहता हुआ रोने लगा। ऐसा लग रहा था मानो बरसों बाद मां से मिला हूं।
*अपनेपन का एहसास:-*
क्योंकि कवि मुकेश की मां भी बचपन में 4 साल का था तब छोड़कर चल बसी थी । पिता भी बहुत बीमार रहने लगे मां के गम के कारण वह भी मुझे छोड़कर चल बसे ।जैसे तैसे मैंने पढ़ाई करके आज लायक बना हूं तो कभी सोचता हूं जिसने मुझे पढ़ाया वही नहीं तो मैं किसके लिए जीऊं यही सोचा करता था मगर आज इनका प्यार मुझे पिता जैसा मिला। आज रिश्तो का एहसास हुआ के रिश्ते भी ऐसे होते हैं। इन रिश्तों में एक रत्ती मिलावट दिखावा नहीं था।
*निष्कर्ष में:-* बस दोस्तों इतना ही कहूंगा कि तुम्हारी जिंदगी में भी कभी ऐसा अवसर आए तो कमाई छोड़ देना पर यह अवसर मत छोड़ना रुपया मां की ममता नहीं देगा ,पिता का दुलार नहीं देगा,रुपया तो जिंदगी में फिर आएगा परंतु यह अवसर बार-बार नहीं आते । कुदरत हमें बड़ी मुश्किल से ऐसे अनूठे अवसर देता है।
शिवा सिंहल आबुरोड






