ऐसे जन भी होते हैं जग में,किसी का वह सगा नहीं।
इस जगत के मेले में भैया,सबको हरदम ठगा वही।।
गैरों की क्या?बात करें तब,अपने ही जब नहीं सही।
हर जगह लाभ देखें अपना,दूजे के हित कभी नहीं।।
अंतर्मन में छल कपट वैर है,चरित्र आचरण भी गंदा।
धोखाधड़ी लूट बेईमानी का,वह चला रखा है धंधा।।
कमी ढूँढ़ते सब के अंदर वह,जिससे बना सकें फंदा।
दुर्गुण भरे संगठन मुखिया,कमाई के स्रोत ढूंढें बंदा।।
जगहितार्थ जैसी सोच नहीं,बस लूटें खाएँ मौज करें।
ऊपर कुछ पहुँचाते होंगे,उसी आड़ सब गटक करें।।
जन कल्याणार्थ सोच नहीं,यह ईश्वर से भी नहीं डरें।
खेल पकड़ में आते हैं जब,ऐसों पर जग हँसा करें।।
ज्ञान नहीं तनिक भी उसको,बनता वो हरदम ज्ञानी।
सबको अपने चंगुल में चाहता,है महामूर्ख अज्ञानी।।
अपनी करनी का फल इसी,धरा भोगते सभी प्राणी।
बोले मधुर अथवा कड़वा,चाहे जितना कोई वाणी।।
ईश्वर ने मनुज तन है देकर,हमसब को दिया उपहार।
प्रेम दया धर्म कर्म मानवता,संवेदना रखने को यार।।
भूल गया इंसान जगत में आते,यही तो नश्वर संसार।
निर्मल मन सुकर्म करें सभी,संग इन हाथों उपकार।।
क्यों? करता है रे! तू मानव,यह जीवन अपना व्यर्थ।
ये तो है अनमोल बहुत ही,जीवन में इसका है अर्थ।।
प्यार बाँट कर देखो एक बार,उसमें इंसाँ बनो समर्थ।
बिगड़े काम सब बन जाएँगे,होगा कोई नहीं अनर्थ।।
लूट खसोट बेईमानी सब,कुछ यहीं धरा रह जाएगा।
सताए हुए लोगों से मनवा,कभी ना इज्जत पाएगा।।
यह कोठी महल अटारी धन,संपत्ति साथ न जाएगा।
धर्म-कर्म संग जाएगा, अधर्म-कुकृत्य सजा पाएगा।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)






