रोशनी बनकर जो उजालों की रवायत दे,
तल्खी- ए- जिस्त में जीने की हिदायत दे।
सजदा ऐसे ही उस्ताद को वाजिब है यहां।
खाक के ज़र्रे को आफताब की लियाकत दे।
अल्फाज को तरतीब देकर हर्फ सीखाते हैं,
गुमनाम हसरतों को पहचान बनाते हैं।
उस्ताद की तवज्जो का एजाज है ये यारों,
कमजोर परिंदों को शाहीन बनाते हैं।
तारीकी से काढ़कर जो परवाज सीखाते हैं,
उस्ताद ही तो जिंदगानी का आगाज बनाते हैं।
बुलंदी – ए – फलक को छूता है वही एक दिन,
जिसकी तरबीयत पर “आकाश” नाज फरमाते हैं।
जिहालत की शब को जो पल में मिटा डालते हैं,
उस्ताद ही तो है जो डूबतो को संभाल लेते हैं।
इल्म की शमा जलाते हैं दिलों में ये “आकाश”
खाक के ज़र्रे को माहताब बना डालते हैं।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश






