आज के वक्त में ग़रज़
मक़ाम तक पहुंँच जाती है!!
ग़रज़ ना हो तो दोस्ती भी
अनछुई सी लगती है!!
बिना ग़रज़ के आजकल
कोई भी साथ नहीं देता!!
ग़रज़ आत्म केंद्रित होती है
ग़रज़ से ही रिश्ते बनते हैं!!
ग़रज़ ना हो तो रिश्ते भी,
अधूरे से लगते हैं!!
ग़रज़ ही रंक से राजा बनाती है
ग़रज़ ना हो तो होनी बात भी,
टल जाती है!!
ग़रज़ हमेशा सामने वाले
व्यक्ति को बहुत ख़ास बनाती है!!
बुरे से बुरे व्यक्ति को भी
कहांँ से कहांँ पहुंँचाती है!!
ग़रज़ में दीनता का भाव होता है
इन्सान की ग़रज़ उसे कहांँ से,
कहांँ पहुंँचाती है..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान






