जीवन- मृत्यु दर्शन 

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जीवन- मृत्यु दर्शन शीतल

निर्मल जल, पोषक

अन्नाहार बोल सुभाषित,

होते महत्व पूर्ण, ये तीन रत्न

जिनसे माँ वसुधा है सुरभित।

 

धन दौलत तो आनी जानी हैं,

हाथों का मैल इसे माना जाता,

यह शिक्षा भावी पीढ़ी को देना

जीवन अति सुगम बनाता है।

 

भोजन, औषधि दोनो समय

समय पर बहुत ज़रूरी हैं,

भोजन औषधि जैसा ही करिये

वरना औषधि भोजन हो जाती है।

 

सच्चे दिल से इंसान जो प्यार

किसी अपने को करता है,

कभी न उसको छोड़ेगा वह

चाहे कितनी भी वजहें हों।

 

यही प्यार का बंधन है, यही

भावना सच्चे प्यार की साखी,

ऐसे प्रिय जन को साथ रखें

बस एक वजह ही है काफ़ी।

 

बहुत कम इंसान यह समझ

सकते हैं कि एक इंसान,

और सच्चा इंसान होने में

कितना ज़्यादा अंतर होता है।

 

इंसान को जन्म के समय

भी प्यार किया जाता है,

और मृत्यु के समय भी उसे

बहुत इज़्ज़त दी जाती है।

 

पर जन्म-मृत्यु के बीच के जीवन

में प्रेम प्यार, सुख दुःख,

पाप पुण्य का भोग ‘आदित्य’

उस इंसान भोगना पड़ता है।

 

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र

 ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

 ‘विद्यासागर’, लखनऊ

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