माँ मेरी मादरे वतन तुझपे जीवन निसार।
तू ही मेरी ज़िन्दगी तू ही मेरी बंदगी,
तुझपे जीवन निसार।
हिम से उतरी गंगा, यमुना सरस्वती संगम करें,
सरयू, गोमती, घाघरा, कोसी कल-कल ध्वनि भरें,
सिंधु, झेलम, चिनाब, सतलुज हैं पंजाब की शान,
तुझपे जीवन निसार।
विंध्य, सतपुड़ा के बीच में नर्मदा बहती रहे,
ताप्ती, चंबल, बेतवा, सोन, महानदी संग बहे।
इनकी कल-कल ध्वनि लगे ज्यों छेड़े भोर तू तान,
तुझपे जीवन निसार।
गोदावरी को दक्षिणी गंगा कहते हैं प्यार से,
कृष्णा, कावेरी, तुंगभद्रा बहतीं मलय बयार से।
स्वच्छ पावन और निर्मल बहती इनकी है धार,
तुझपे जीवन निसार।
पर्वतों में सबसे ऊँचा हिमालय तेरी शान माँ,
एवरेस्ट, कंचनजंगा तेरे उन्नत भाल माँ,
अरावली की पहाड़ियाँ तेरा करती हैं शृंगार,
तुझपे जीवन निसार।
नदियाँ जीवन मुक्ति दाता, पर्वत रक्षक हैं विधाता,
तेरे पहरेदार सब तुझसे सच्चा सबका नाता,
हम हैं गर्वित देख नदियाँ अपने सजग पहाड़,
तुझपे जीवन निसार।
— संगीता शिवपुरी






