मै रोज़ सुबह उठती थी। सबके चेहरों पर मुस्कान लाती थी। लोग मुझे देखकर कहते, “तुम कितनी खुशकिस्मत और खुशमिजाज हो।” मै हर बार बस मुस्कुरा कर रह जाती।
मेरे भीतर एक गहरा सूनापन था। एक ऐसा दर्द था, जिसे मै किसी को समझा नहीं सकती थी। कई बार मैने कोशिश की कि अपना दिल किसी के सामने खोलकर रख दे। पर जैसे ही मै बोलने लगती, शब्द मेरा साथ छोड़ देते।
मुझे महसूस हुआ कि कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि उनके लिए कोई भाषा बनी ही नहीं है। अगर उन्हें जुबां पर लाया जाए, तो उनका वजन कम नहीं होता, बल्कि सुनने वाले की आँखों में सिर्फ बेबसी रह जाती है। एक शाम, मैने अपनी पुरानी डायरी खोली। पेन उठाया कि अपने हाल-ए-दिल को कागज़ पर उतार ले। पर पन्ना सुबह तक कोरा ही रहा। मैने पेन नीचे रख दिया और खिड़की से बाहर आसमान को देखने लगी।
अचानक मुझे एक अजीब सी शांति महसूस हुई। मुझे समझ आ गया कि हर दर्द का बयां होना ज़रूरी नहीं है। कुछ दर्द इंसान को अंदर से मजबूत बनाने के लिए होते हैं। मैने अपने उस अनकहे दर्द को खुद ही अपना हमसफर मान लिया, एक लंबी सांस ली और चैन से सो गई। आज भी मै सबके दर्द को सुनती हूँ तो खुद के दर्द को किसी से भी बयां नहीं करती बल्कि सबको समझाती हूँ और हंसती रहती हूँ।
स्वरचित एवं मौलिक
संगीता वर्मा, कानपुर
उत्तर प्रदेश






