अंतर्मन असुप्त अवस्था में हो,तब ये जागृति आती है।
ईश कृपा से सभी मानव में,चेतना संचेतना आती है।।
मन बुद्धि आत्मा ये प्रसन्न,इंसाँ जागरूक हो जाता है।
सुप्त रहेंगे पाएँ न कुछ,चैतन्य मन सबकुछ पाता है।।
माँ वीणा पाणी कृपा से ही,अन्तस का तिमिर छंटता।
दिव्यज्योति से ज्योतिर्मय ये,शिक्षा का सूरज उगता।।
तम ये करती नाश चेतना,संसार प्रकाशमय करता है।
ये मानव ऐसा प्राणी है वो,जग कल्याण ये करता है।।
ज्ञानामृत से उर भर जाए,ये सोच शुचि सुंदर हो जाए।
सत्य मार्ग चलने वाले यह,जागृत मानव है कहलाए।।
चेतना रहित जन जगत में,जीवन में कुछ कर न पाए।
जड़ता में जीने वाले इंसान,कभी सुख नहीं वो पाए।।
यूँ तो प्रभु के हर रचना में,हर जीवों में चेतना होती है।
समस्त योनि में सिर्फ मानव,चेतना सर्वोपरि होती है।।
प्रेम दया करुणा ममता,संवेदना का ये इंसाँ में संचार।
बल बुद्धि विद्या विवेक कर्म,संग भरे घमंड अहंकार।।
इस नश्वर काया पर सही नहीं,करना इतना अभिमान।
चेतन मन समाज हितार्थ लगे,ध्यान रखें स्वाभिमान।।
मानव जीवन बार-बार मिले न,है नश्वर जगत संसारा।
चेतन मनवा जियो प्यार संग,प्रभु भजन यह सहारा।।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक समाजसेवी)






