सद्कर्म सद्व्यवहार सदाचार हैं 

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आजकल श्राद्ध तर्पण पिंडदान,

आडम्बर बतलाये जाने लगे हैं,

सनातन धर्म व आस्था विश्वास

पाखण्ड सिद्ध किये जाने लगे हैं।

 

मन्दिर की मूर्तियों को पत्थर कह

जीवित इंसान की बात होती है,

मंदिर के भगवान का मज़ाक़ कर,

आस्था-विश्वास चोट खा रही है।

 

प्रार्थना और ध्यान मानव जीवन

की एकाग्रता लिए आवश्यक हैं,

प्रार्थना में ईश्वर हमारी बात सुनते हैं,

ध्यान में हम ईश्वर की बात सुनते हैं।

 

किसी दूसरे की बुराई करने से

अच्छा अपनी बुराई ढूंढ निकालें,

प्रार्थना और ध्यान के बल पर उसे

सदा सर्वदा के लिये त्याग कर दें।

 

आदित्य बुराई करें जो बुरा है,

सदकर्म सद्व्यवहार सदाचार हैं,

श्राद्ध पितरों का या जीवित का,

आस्था व विश्वास का आधार है।

 

डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र

‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

‘विद्यासागर’, लखनऊ

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