*हिंदी वर्ण माला के स्वर व्यंजन से रची मेरी कविता

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*अ* अभी समय है,मत व्यर्थ न गंवाएं।

*आ* आओ यह,जीवन सफल बनाएं।।

*इ* इधर-उधर की, छोड़ सभी कुछ।

*ई* ईश्वर से भक्ति,करो कभी कुछ।।

*उ* उर तल में कुछ,सुंदर गुण भर लो।

*ऊ* ऊपर वाले की,कृपा को भर लो।।

*ऋ* ऋषि मुनि से,सब बातें अच्छी।

*ए* एक राह तू, चुन ले जो सच्ची।।

*ऐ* ऐसी-वैसी नहीं,जो नेक राह हो।

*ओ* ओम नाम का,उर में वास हो।।

*औ* और कोई,भले ही न साथ हो।

*अं* अंग प्रत्यंग,ये स्वस्थ साथ हो।।

*अ:* अ: यह कितना,सुंदरतम होगा।

*क* कभी किसी को, कष्ट न होगा।।

*ख* खले अगर कुछ, तो सह लेना।

*ग* गलत कभी ये,निर्णय न लेना।।

*घ* घबराएं जब,प्रभु नाम ये जपना।

*ङ्ग* अंगारों पे भले,तुम्हें हो चलना।।

*च* चलता रहे,यह जीवन सुखमय।

*छ* छल-कपट से, दूर रहें निर्भय।।

*ज* जग है सुंदर, यहाँ खुश रहें सब।

*झ* झगड़े-झंझट से,ये दूर रहें सब।।

*इयाँ(त्र)* इयाँन,अच्छी छोटी गाड़ी।

*ट* टलती बला,जब चलें पिछाड़ी।।

*ठ* ठहरो,सोचो, क्या है करना ?

*ड* डरना है या,गर्व से है रहना।।

*ढ* ढलें उगें जैसे,गगन में प्रभाकर।

*त* तरना चाहें, यदि ये भवसागर।।

*थ* थम के रहें,शक्ति भ्रम न करना।

*द* दम प्रभु भक्ति में, लगा रखना।।

*ध* धन कुछ लगे,निर्धन के सेवा में।

*न* नर ही नारायण हैं,उस सेवा में।।

*प* परमात्मा का रूप, उसे भी जानें।

*फ* फरिश्ता बन,दुःख दर्द पहचानें।।

*ब* बनें मसीहा उनका,आशीष पाएँ।

*भ* भक्त व, भक्तवत्सल बन जाएँ।।

*म* मन की सुख शांति,सदैव पाएँ।।

*य* यहीं स्वर्ग है,यहीं नर्क हम पाएँ।

*र* रब कम दे,ज्यादा दे,क्या फर्क है?

*र* रहो प्रेम से,मेरा तो यही तर्क है।।

*ल* लब पे हो नाम,केवल प्रभु का।

*व* वही करता,बेड़ा पार सब का।।

*स* सत्य राह पर ही, हरदम चलना।

*ष* षड़यंत्रों से दूर,हमेशा ही रहना।।

*श* शराफत,ईमान,में पहचान बनें।

*ह* हरदम केवल,शुचि इंसान बनें।।

*क्ष* क्षमा भावना,रखना श्रेष्ठ प्रदर्शन।

*त्र* त्रय प्रभु की कृपा, का हो दर्शन।।

*ज्ञ* ज्ञप्ति बनाए ज्ञानी,बनें हर जन।

*ज्ञ* से ही ज्ञानी,बन ज्ञान देता मन।।

 

 

 

*नोट*: *ण* (देवनागरी वर्णमाला में टवर्ग का पाँचवां व्यंजन है।

इससे कोई शब्द ही नहीं बना है,किन्तु संस्कृत से आए शब्दों का *ण* ही हिंदी के तद्भव शब्दों में प्रायः *न* बन जाता है।

उदाहरण स्वरूप जैसे- रामायण(रामायन),बाण(बान),कारण(कारन),मरण(मरन)आदि

इसलिए कविता में *ण* से कोई पंक्ति लिखना संभव नहीं है।

 

कविता पूर्ण करने की दृष्टि से *र* और *ज्ञ* का प्रयोग दो बार इसमें किया गया है।

 

 

 

सर्वाधिकार सुरक्षित ©®

 

रचयिता :

 

*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.

(शिक्षक,कवि,लेखक, साहित्यकार, लघुकथाकार,समीक्षक एवं समाजसेवी)

इंटरनेशनल ज्वाइंट ट्रेजरर, 2023-2024, ए. सी.आई.

एलायंस क्लब्स इंटरनेशनल,कोलकाता,प.बंगाल,भारत

(वरिष्ठ समाजसेवी-प्रांतीय,राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सेवा संगठन)

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