*अ* अभी समय है,मत व्यर्थ न गंवाएं।
*आ* आओ यह,जीवन सफल बनाएं।।
*इ* इधर-उधर की, छोड़ सभी कुछ।
*ई* ईश्वर से भक्ति,करो कभी कुछ।।
*उ* उर तल में कुछ,सुंदर गुण भर लो।
*ऊ* ऊपर वाले की,कृपा को भर लो।।
*ऋ* ऋषि मुनि से,सब बातें अच्छी।
*ए* एक राह तू, चुन ले जो सच्ची।।
*ऐ* ऐसी-वैसी नहीं,जो नेक राह हो।
*ओ* ओम नाम का,उर में वास हो।।
*औ* और कोई,भले ही न साथ हो।
*अं* अंग प्रत्यंग,ये स्वस्थ साथ हो।।
*अ:* अ: यह कितना,सुंदरतम होगा।
*क* कभी किसी को, कष्ट न होगा।।
*ख* खले अगर कुछ, तो सह लेना।
*ग* गलत कभी ये,निर्णय न लेना।।
*घ* घबराएं जब,प्रभु नाम ये जपना।
*ङ्ग* अंगारों पे भले,तुम्हें हो चलना।।
*च* चलता रहे,यह जीवन सुखमय।
*छ* छल-कपट से, दूर रहें निर्भय।।
*ज* जग है सुंदर, यहाँ खुश रहें सब।
*झ* झगड़े-झंझट से,ये दूर रहें सब।।
*इयाँ(त्र)* इयाँन,अच्छी छोटी गाड़ी।
*ट* टलती बला,जब चलें पिछाड़ी।।
*ठ* ठहरो,सोचो, क्या है करना ?
*ड* डरना है या,गर्व से है रहना।।
*ढ* ढलें उगें जैसे,गगन में प्रभाकर।
*त* तरना चाहें, यदि ये भवसागर।।
*थ* थम के रहें,शक्ति भ्रम न करना।
*द* दम प्रभु भक्ति में, लगा रखना।।
*ध* धन कुछ लगे,निर्धन के सेवा में।
*न* नर ही नारायण हैं,उस सेवा में।।
*प* परमात्मा का रूप, उसे भी जानें।
*फ* फरिश्ता बन,दुःख दर्द पहचानें।।
*ब* बनें मसीहा उनका,आशीष पाएँ।
*भ* भक्त व, भक्तवत्सल बन जाएँ।।
*म* मन की सुख शांति,सदैव पाएँ।।
*य* यहीं स्वर्ग है,यहीं नर्क हम पाएँ।
*र* रब कम दे,ज्यादा दे,क्या फर्क है?
*र* रहो प्रेम से,मेरा तो यही तर्क है।।
*ल* लब पे हो नाम,केवल प्रभु का।
*व* वही करता,बेड़ा पार सब का।।
*स* सत्य राह पर ही, हरदम चलना।
*ष* षड़यंत्रों से दूर,हमेशा ही रहना।।
*श* शराफत,ईमान,में पहचान बनें।
*ह* हरदम केवल,शुचि इंसान बनें।।
*क्ष* क्षमा भावना,रखना श्रेष्ठ प्रदर्शन।
*त्र* त्रय प्रभु की कृपा, का हो दर्शन।।
*ज्ञ* ज्ञप्ति बनाए ज्ञानी,बनें हर जन।
*ज्ञ* से ही ज्ञानी,बन ज्ञान देता मन।।
*नोट*: *ण* (देवनागरी वर्णमाला में टवर्ग का पाँचवां व्यंजन है।
इससे कोई शब्द ही नहीं बना है,किन्तु संस्कृत से आए शब्दों का *ण* ही हिंदी के तद्भव शब्दों में प्रायः *न* बन जाता है।
उदाहरण स्वरूप जैसे- रामायण(रामायन),बाण(बान),कारण(कारन),मरण(मरन)आदि
इसलिए कविता में *ण* से कोई पंक्ति लिखना संभव नहीं है।
कविता पूर्ण करने की दृष्टि से *र* और *ज्ञ* का प्रयोग दो बार इसमें किया गया है।
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रचयिता :
*ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव*
सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता-पी.बी.कालेज,प्रतापगढ़,उ.प्र.
(शिक्षक,कवि,लेखक, साहित्यकार, लघुकथाकार,समीक्षक एवं समाजसेवी)
इंटरनेशनल ज्वाइंट ट्रेजरर, 2023-2024, ए. सी.आई.
एलायंस क्लब्स इंटरनेशनल,कोलकाता,प.बंगाल,भारत
(वरिष्ठ समाजसेवी-प्रांतीय,राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सेवा संगठन)






