भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया। जिस हिन्दी भाषा को पराधीन भारत के नेताओं ने राष्ट्रभाषा की संज्ञा दी तथा जिस हिन्दी की भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, भारतीय नेताओं द्वारा स्वतन्त्रता के बाद भारतीय संविधान में राजभाषा का दर्जा देकर हिन्दी के प्रति अपना आभार प्रकट किया । लेकिन यह हिन्दी के सम्मान से ज्यादा उस पर कुठाराघात अधित प्रतीत होता है क्योंकि जिस हिन्दी को पूरा भारत वर्ष स्वतन्त्रता आन्दोलन में राष्ट्रभाषा का सम्मान देता रहा, उसे 1949 में राष्ट्रभाषा के पद से गिराकर एक गौण राजभाषा का दर्जा प्रदान किया।
मैकाले के मानसपुत्रों ने 1963 में अंग्रेजी को अनंतकाल तक के लिए मान्यता दे दी। राजभाषा अंधिनियम 1963 की धारा 3(5) में यह सर्वसम्मति से प्रावधान किया गया कि जब तक एक भी राज्य ऐसा रहता है जो अंग्रेजी को हटाकर हिन्दी को नहीं अपनाता है, तब तक अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में भारतवर्ष में प्रयोग में लाई जाती रहेगी अर्थात् न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। इसके पश्चात् एक आघात सन् 1976 के संशोधन से लगा। इस संशोधन के अनुसार पूरे भारतवर्ष के प्रांतों को ‘क’ (उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा आदि हिन्दी भाषी क्षेत्र) ‘ख’ (पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और केन्द्र शासित प्रदेश चण्डीगढ़ तथा अंडेमान निकोबार) तथा ‘ग’ (पं॰ बंगाल, उड़ीसा, उत्तरपूर्वी क्षेत्र, द्रविड़ भाषी राज्य) आदि वर्गों में विभाजित कर दिया । ‘क’ वर्ग के अन्तर्गत आने वाले राज्य केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार के किसी कार्यालय को या व्यक्ति को हिन्दी में पत्र लिखें । ‘ख’ वर्ग के कार्यालयों को सामान्यतः हिन्दी में पत्र भेजे जाएं। यदि कोई पत्र अंग्रेजी में भेजा जाए तो हिन्दी अनुवाद अवश्य संलग्न किया जाए। ‘ग’ वर्ग अंतर्गत आने वाले कार्यालयों को पत्रादि अंग्रेजी में भेजे जाएं। स्पष्ट है कि सम्मानित राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रतिष्ठित होने के सभी रास्ते अवरूद्ध है और शायद इस अवरूद्धता को राष्ट्र की आंखों से ओझल करने के लिए पिछले दो दशकों से ‘हिन्दी दिवस’, ‘हिन्दी सप्ताह’ और ‘हिन्दी पखवाड़ा’ मनाए जाने का प्रावधान किया गया है।
आज देश का कौन-सा ऐसा प्रान्त है जहां के लोग हिन्दी बोल-समझ नहीं पाते? अब तो दक्षिण भारतीयों का उत्तरी क्षेत्रों की ओर पलायन और दक्षिण भारतीय शहरों में शिक्षा और रोजगार के लिए उत्तर भारतीयों के जाने से अब वहां भी हिन्दी अछूती नहीं रही। अब तो विदेशों में भी हिन्दी भाषा के महत्त्व को भली-भांति समझा जा रहा है। एक तरफ हिन्दी सिनेमा एवं हिन्दी गीत-संगीत ने पूरे विश्व समुदाय को मोह लिया है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय बाजारों में अपने भविष्य और संभावनाओं को तलाश रहे बाहरी देश एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां परिस्थितियों को समझते हुए हिन्दी भाषा ज्ञान को अनिवार्य तत्त्व के रूप में अपना रही है।
एक और क्षेत्र है जहां हिन्दी भाषा एवं साहित्य को अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। वह क्षेत्र है मीडिया जगत् का दिनों-दिन बढ़ता दायरा। हिन्दी समाचार चैनलों की संख्या भविष्य में और अधिक बढ़ने वाली है। मनोरंजन जगत् में हिन्दी भाषा का साम्राज्य अन्य सभी भाषाओं से ज्यादा बड़ा है। बॉलीवुड की हिन्दी सिनेमाओं की धमक तो अब विश्व मनोरंजन जगत् में भी सुनाई देने लगी है।
फिर क्यों हमारी राजभाषा हिन्दी को वो प्रतिष्ठा नहीं मिल पा रही, जिसकी वो अधिकारिणी है। अंग्रेजी भाषा वह भाषा है जिसे भारत में मुश्किल से दो प्रतिशत लोग जानते हैं, फिर भी उस भाषा का हम पर अंकुश क्यों? आज हिन्दी जन-संचार, विज्ञापन, व्यापार, रोजगार, वाणिज्य, तकनीक, चिकित्सा आदि लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत बना रही है। देशी-विदेशी भाषाओं को स्वयं में समाहित करने की सामथ्र्य रखने वाली हिन्दी का शब्दकोश पहले से अधिक सशक्त एवं समृद्ध है। आज हिन्दी कम्प्यूटर व इंटरनेट पर भी अपनी गरिमापूर्ण स्थिति के साथ देखी जा सकती है।
संसार के करीब आने के दौर में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस व रूस आदि देशों में हिन्दी को पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है। सूरीनाम, फिजी, माॅरिशस आदि में तो हिन्दी की स्वीकार्यता सभी जानते है। परन्तु इतना सब होने के बावजूद भी हमारी संसद की नीयत खोटी है, सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव है तथा राजनीतिक दलों में विवेकशून्यता है। तभी तो 1949 से अब तक हिन्दी को सह-राजभाषा के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण है, सभी बड़ी शख्सियतों का हिन्दी को त्याग कर अंग्रेजी को अपनाना। ये एक आम प्रवृत्ति या चलन बन गया है कि कोई भी सार्वजनिक तौर पर हिन्दी बोलना ही नहीं चाहता। चाहे फिल्म अभिनेता हों या संगीतकार, खिलाड़ी हों या चित्रकार और इनसे बढ़कर हैं हमारे जनप्रतिनिधि। बोलने का स्थान चाहे देश हो, विदेश हो – कोई हिन्दी में बात नहीं करना चाहता क्योंकि हमारे देश में अंग्रेजी सामाजिक श्रेष्ठता का भी आधार बन गई है।
उच्च-घरानों के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले बड़े लोग अपने घरों में, परिवार में, बाल-बच्चे, नौकर-चाकर, माली-धोबी, दूधवाले से अंग्रेजी में बातचीत करते हैं या फिर कौन-सा राजनेता है जो अपने क्षेत्र में वोट अंग्रेजी में मांगता है? अपने लुभावने वायदे और घोषणा अंग्रेजी में करता है अर्थात् ये सभी कार्य हिन्दी में किये जाते हैं।
यह ध्यान रहे कि भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम मात्र नहीं है अपितु भाषा हमारे विचार, भाव, संस्कार व संस्कृति की सशक्त संवाहिका है। ऐसा नहीं है कि हमें अन्य भाषाएं सीखनी नहीं चाहिएं, जरूरी सीखनी चाहिएं क्योंकि इसके बिना हम दूसरों की संस्कृति, साहित्य, आचार-विचार नहीं जान पाएंगे। दूसरी भाषाएं सीखें परन्तु अपनी जड़ों से जुड़े रहें क्योंकि भाषा ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर को हम तक पहुंचाती है। अपनी भाषा हर जगह, हर क्षेत्र में अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है। इसलिए हमें अपनी भाषा हिन्दी का प्रयोग करने पर हीनता का नहीं बल्कि गौरव का अनुभव होना चाहिए।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला
रोहतक (हरियाणा)






