मन की व्यथा का राज खोल गया ।
इशारों ही इशारों में बात हुई,
हथेली में ही उससे मुलाकात हुई।
यारों जमीं पे खतों की बरसात हुई,
सन्नाटे सी विरानीयो में रोशन खुशियों की बाहर हुई ।
अश्क को देख खाली गगरी भी झलकने लगी,
बुझे-बुझे मन में दीदार की आस मचलने लगी।
ये सांसे बेधड़क धड़कने लगी,
हवाएं भी बेशर्म होकर मचलने लगी।
बलखाती जुल्फे इत्र सी महकने लगी,
उसकी मुस्कान कानों में पायल सी छनकनें लगी ।
ऐ एक अश्क ने जोकर सा कमाल कर दिया,
गली में धमाल तो दिल में तहलका मचा दिया। Rd”
शिवा सिंहल आबुरोड






