आज मानव की मानवता थम गई है
विधा।। गीत
आज मानव की मानवता थम गई है।
संवेदनाओं की बहती धारा जम गई है।।
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घर उनका बड़ा और भव्य बन गया है।
निवास आलीशान और नव्य बन गया है।।
मनुष्य मन पिपासा अब बन धन गई है।
आज मानव की मानवता थम गई है।।
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मन और तन में भावनाएं शून्य हो गई हैं।
नैतिकता स्तरहीनऔर बस न्यून हो गई है।।
लगता है लहू की रवानी हो कम गई है।
आज मानव की मानवता थम गई है।।
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किसी के लिए दर्द संवेदना सुप्त हो गई है।
निस्वार्थ सद्भावना बात ही लुप्त हो गई है।।
वही दुखी जिनके मन भावना अहम भर गई है।
आज मानव की मानवता थम गई है।।
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रचयिता।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।
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