एक तरफ़ दर्द

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शीर्षक : एक तरफ़ दर्द था, दूसरी तरफ़ फ़र्ज़ था

एक तरफ़ दर्द था, दूसरी तरफ़ फ़र्ज़ था,

ज़िंदगी के तराज़ू पर, बोझ-बोझ दर्ज़ था।

करता कैसे फ़ैसला ,अपने दिल के ख़िलाफ़,

बहन की हर पीड़ा में भाई का ही फ़र्ज़ था।

 

बड़ी स्वाभिमानी थी, लाडली थी वो सबकी,

मौत से जूझती रही, कैंसर जिसका मर्ज़ था।

उठाते रहे खर्च मिलकर,बाप और भाई दोनों,

इलाज के हर मोड़ पर ,खोने का ही डर था।

 

बोझ उठाया बहुत बाप ने, घर के कोने-कोने का,

घर की ज़िम्मेदारी थी, घर का वही सरताज था।

छोड़ दी थीं उसने,जरूरतें कब की अपनी,

पिता होना सिर्फ़ रिश्ता नहीं-एक फ़र्ज़ था।

 

छोड़ गया सबको तन्हा, अगले दिन ही वो,

क्या करता बेचारा, सिर पर लाखों का कर्ज़ था।

दो दो जनाजे उठे घर में,घर सारा उजड़ गया,

एक तरफ़ ममता मरी, दूसरी तरफ़ सब्र था।

 

सिर्फ दर्द के ये आँसू नहीं, फ़र्ज़ हैं हालात के,

कवि सम्मेलन में था, ख़बर से बेख़बर था ।

दोनों फ़र्ज़ निभाने थे,दिल में दर्द और सब्र था।

‘दिव्य’ कहे दोस्तों,यह फ़र्ज़ निभाना सर्वथा।।

 

*दिनेश पाल सिंह दिव्य*

*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*

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