खिड़की पर ठहरी शाम,
मुझे देखकर मुस्कुराती है।
सूरज की आखिरी किरण,
आसमान में मिल जाती है।
हवा ने छूकर मेरे मन को,
कुछ अनकही बातें कही।
पंछियों के लौटते झुंड ने,
घर की राह पकड़ी सही।
चाय की प्याली हाथों में,
कुछ यादें जगा गई।
बीते लम्हों की बातें,
मन को दस्तक दे गई।
खिड़की से देखी दुनिया,
अपनी मंजिल को जाती है।
खिड़की पर ठहरी शाम,
मुझे ही मिलने आती है।
हर ढलती हुई शाम मुझे,
जीवन का अर्थ समझाती है।
कल की चिंता ना करो,
जिंदगी आज में जी जाती है।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






