जब पितर लौटते हैं

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पितृपक्ष में

घर का बंद संदूक

जाने क्यों

कुछ अधिक अपना लगता है।

 

कपड़ों के बीच दबी

पुरानी गंध

चुपके से उठती है

और कमरा

किसी भूले हुए स्पर्श से भर जाता है।

 

न कोई दस्तक,

न पगचाप,

फिर भी

दीवार की घड़ी

कुछ पल धीमी चलती है,

मानो समय

किसी परिचित चेहरे के सामने

ठिठक गया हो।

 

दादी की चाँदी की डिबिया,

बाबा की पुरानी कलम,

संदूक में रखी

एक अधूरी चिट्ठी

छोटी-छोटी चीज़ों में

कितना बड़ा जीवन

चुप बैठा है!

 

अंजलि में जल लिया

तो लगा

मेरी हथेली पर

सिर्फ़ जल नहीं,

पीढ़ियों की पारदर्शी स्मृति है।

 

कुछ दाने अर्पित किए

तो याद आया

मेरी थाली तक पहुँचने से पहले

अन्न ने कितनी हथेलियाँ देखी होंगी,

कितनी धूप सही होगी,

कितने श्रम से

जीवन पाला गया होगा।

 

हम जो हैं,

अकेले कहाँ हैं?

 

हमारी बोली में

किसी पुरखे की लय है,

हमारी आदतों में

किसी बुज़ुर्ग की छाया,

हमारी हँसी में

किसी पुराने आँगन की धूप,

और हमारी आँखों में

शायद कोई सपना

अब भी अपना रास्ता खोज रहा है।

 

इसलिए

श्राद्ध केवल विधि न रहे,

किसी भूखे के हिस्से में

अपनी थाली का अन्न रखिए,

किसी अकेले के पास

दो घड़ी बैठिए,

किसी वृद्ध की बात

बिना अधीर हुए सुनिए।

 

यही वह अर्पण है

जो नदी में नहीं बहता,

मनुष्य से मनुष्य तक

पहुँचता है।

 

क्योंकि पितर

सिर्फ़ तिथियों पर नहीं आते—

वे तब लौटते हैं

जब कोई उनके संस्कार को

अपने आचरण में उतारता है।

 

और उस क्षण

तस्वीर पर रखा फूल

महज़ फूल नहीं रहता—

वह कहता है—

 

“वंश रक्त से नहीं,

संस्कारों से आगे बढ़ता है।”

 

डॉ अपराजिता शर्मा

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