ख्यात साहित्य साधक अपने जीवन में आरम्भ से ही कुछ अलग रंग में जीते हैं और यह बात
उनके घी वालो को भी पता नहीं
केवल उनकी पत्नी स्व उषा जी बल्कि पहली पत्नी राजेश्वरी जी भी जानती थी या फिर उन्हें सड़क पर देखने वाले चंद कुछ लोग
अक्सर जीवन में सदा पत्नी के साथ ही धूमते थे ताकि उन्हें कोई बेवजह रोके नहीं व्यर्थ आपचारिकता बातों से कोसों दूर रहे
खैर धूमते हुए मस्ती में गीत गुनगुनाते चलने का अजीब नशा तो है ही रहा चलते सड़क के किनारे से दो छोटे छोटे पत्थर को
सड़क पर लाते हुए फिर उन्हें अपने पैरों से चपल से मारते हुए आगे ले जाते हुए चलते जाते पत्नी साथ चलती रहती बाते करती सुनते भी जाते और उन पत्थरों से खेलते हुए मस्ती से चलते जाते, एक पैर से एक पत्थर को मारते हुए आगे बढ़ाते है फिर दूसरे पैर से दूसरा पत्थर कभी कभी दूसरा पत्थर पहले पथ्थर से टकरा जाता है जिसे देख ख़ुद आनंदित हो जाते हुए पत्नी से कहते तुम ऐसा कर सकती हो, पत्नी स्व उषा जी तुंरत जवाब देती तुम करा करो मुझे नहीं करना सभी लोग देख रहे हैं तुम्हें रास्ते चलते हुए क्या सोच रहे होगी यह आदमी क्या कर रहा है
पागल हो नहीं, हम भी तुरंत जवाब देते, लोग क्या सोच रहेंगे होगे यह तुम सोचो मुझे लोगों से क्या लेना देना कौन क्या सोच रहा मेरे लिए
बस बात खत्म फिर दोनों अपनी मस्ती में वह बोलती में सुनता पत्थरों से खेलते हुए लंबा सफर तय कर लेते दोनों ही प्रतिदिन आठ दस मिलो,मीटर
आज वह नहीं है साथ पर उसका अहसास लिए उसी मस्ती में गीत गुनगुनाते हुए पत्थरों से खेलते हुए मस्ती में धूमता हूं इतना ही जितना पहले धुनता था
दूसरा धुनते हुए रास्ते में दो तीन बार रुकता हूं और चारों दिशाओं में ऊंची ऊंची पहाड़ियों पर विराजमान ईश्वर के देव स्थल को प्रणाम करता हूं और प्रकृति को प्रणाम करते हुए विश्व कल्याण को मन ही मन प्रार्थना करता हूं
पत्नी स्व उषा भी रुक जाती है पर चुपचाप खड़ी रहतीं है वही बात क्या कहेगे लोग यह आदमी क्या करता है चारों दिशाओं में रोज़ यहां खड़ा हो हाथ जोड़ता है
कभी कभी जो पहली बार मुझे देखता यह करते हुए वह अक्सर उस तरफ पहाड़ियों पर देखने लगता है क्या है वहां जो यह आदमी हाथ जोड रहा है
हिंदू धर्म और मुस्लिम धर्म दोनों के देव स्थल के कुछ अंश दिखाई देते हैं कुछ समझ जाते है कुछ नहीं भी फिर आगे एक और देव स्थल है ईसाई धर्म का यह सुकून लिए स्थान है यहां से ऊंची ऊंची पहाड़ियों अच्छी नज़र आती हैं है और चारों तरफ घने पेड़ हैं यही कुछ देर हम दोनों बैठ जाते है आराम भी मिल जाता हूं और सुकून भी
यह सब कुछ चालीस साल से करते हुए जी रहे डॉ रामशंकर चंचल झाबुआ प्रतिनिधि कालोनी में ही अपने मकान के बहुत करीब
शीतला माता मंदिर है सालों से हर रोज़ सुबह और शाम जाते है प्रणाम करते हैं यह सत्य अक्सर ज्यादा लोग जानते है उनके घर के ही और कुछ जो मां के मंदिर के पास रहते हैं
आप नहीं जानते होगे अक्सर लोग उन्हें नास्तिक मानते है क्यों कि वह किसी भव्य मंदिर दस्तक देते नहीं देखते कभी पूजा पाठ करते हुए माला लिए सिर पर लंबा टीका किए नहीं दिखे
कभी पीले या भगवा वस्त्रों में नहीं देखे
वो भी खुश है कि लोग उन्हें नास्तिक मानते है कहते हैं मुझे लोगों को कुछ नहीं दिखना है में अपना जीवन है अपनी मस्ती में जीता हु वही करता हूं जो मुझे अच्छा लगता हैं
अजीब इंसान हैं साहब सैकड़ों सैकड़ों बातें है जो लाखों करोड़ों से भिन्न हैं यही वजह है कि आज देश और दुनिया चौक रही हैं और वो मस्ती में वैसे ही जैसे सदियों से है






